वदनय करम क परकतय

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Authors: Sapana Ajit Parakh
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Abstract

इस लोक में हर जीव का लक्ष्य और चाहत एक ही है। सुख प्राप्ति और दुख मुक्ति। मगर चाहने के अनुसार ही कहाँ सब कुछ मिलता है। सुख और दुख आत्मा के उदय में आए कर्म अर्थात पुण्य-पाप के अनुसार प्राप्त होते हैं। जीव अपने विचारों और वासनाओं के अनुरूप अपना भाग्य निर्माण करता है। 'बुद्धिः कर्मानुसारिणा'- जैसे कर्म वैसे फल। बुरे कर्म असाता या दुःख रूप में फल देते हैं वहीं अच्छे कर्मों का साता या शुभ रूप में विपाकोदय होता है। आठ कर्मों में वेदनीय ऐसा कर्म है जिसका अनुभाव राग-द्वेष को बढावा देता है तथा जीव चौरासी लाख जीव योनियों में निरंतर भटकता रहता है। इस भटकन, इस चक्रव्यूह से निकलने कि लिए हमें बाहर से भीतर की ओर जाना होगा। भीतर उतरने के लिए कोई एक सहारा चाहिए। ज्ञान से खूबसूरत सहारा और भला क्या हो सकता है। ज्ञान भीतर उतरने के लिए सीढी है क्योंकि यह ज्ञान यानि यथार्थ ही हमारे चारों ओर व्याप्त है, बस हमें अपने भीतर के आवरण को हटाकर जागृत होने की आवश्यकता है । अप्पा सो परमप्पा

Fields of Study & Subjects

Military Technology and Strategies Legal and Regulatory Analysis Linguistic Cultural and Literary Studies

Publication details

Journal / source
International Journal of Sanskrit Research
Volume
12
Issue
1
Pages
05–12
Publication date
1 January 2026