उपनषद म परमख दरशनक ततव क अवधरण
Abstract
उपनिषद्-परंपरा भारतीय अध्यात्म, दर्शन और चिंतन की आधार-शिला मानी गई है ।उपनिषद्-साहित्य में ब्रह्म, जीव, जगत्, अविद्या, बंधन एवं मोक्ष-ये प्रमुख दार्शनिक तत्त्व वेदांत की समग्र संरचना का मूलाधार हैं । ब्रह्म को “सत्यं ज्ञानम् अनन्तं ब्रह्म” के रूप में नित्य, सर्वव्यापक, चेतन और अद्वैत सत्ता कहा गया है; जीव को “एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः” के आधार पर सूक्ष्म, चैतन्यस्वरूप और ब्रह्म का अंश/प्रतिबिम्ब माना गया है । जगत् को “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” तथा “सदेव सोम्य इदं अग्रे आसीत्” के आधार पर ब्रह्म की अभिव्यक्ति या विशिष्ट रूप बताया गया है । अविद्या को उपनिषद् संसार-बंधन का मूल कारण और मोक्ष को आत्मस्वरूप की अनुभूति-“ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति”-के रूप में परिभाषित करते हैं । इन तत्त्वों की व्याख्या शंकर, रामानुज और मध्व की विभिन्न वेदान्त-परंपराओं में भिन्न दृष्टियों से की गई है । प्रस्तुत शोध-पत्र उपनिषदों के इन मूल दार्शनिक तत्त्वों की स्वरूप-मीमांसा, पारस्परिक संबंध, तथा ब्रह्म, जीव, जगत्, अविद्या, बंधन और मोक्ष की अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत दृष्टियों के तुलनात्मक विश्लेषण पर केन्द्रित है ।
Fields of Study & Subjects
Indian and Buddhist Studies
Study and Philosophy of Religion
Indian History and Philosophy
Publication details
- Journal / source
- International Journal of Sanskrit Research
- Volume
- 12
- Issue
- 1
- Pages
- 85–91
- Publication date
- 1 January 2026