वयपत एव सजञनतमक वयवहर चकतस (CBT) तरकसगरह क टकओ क आलक म नकरतमक वचरक परतरप क परशधन क एक तलनतमक एव वशलषणतमक अधययन

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Authors: विक्रम कुमार झा, आशीष कुमार
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Abstract

प्रस्तुत शोध पत्र न्याय दर्शन की ज्ञानमीमांसा और आधुनिक संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के मध्य एक सेतु का निर्माण करता है। शोध का मुख्य केंद्र 'व्याप्ति' की अवधारणा है, जिसे तर्कसंग्रह में हेतु और साध्य के नियत साहचर्य के रूप में परिभाषित किया गया है। अध्ययन के प्रथम चरण में यह प्रतिपादित किया गया है कि किस प्रकार मनुष्य के दुःख का मूल कारण 'मिथ्या ज्ञान' और गलत अनुमिति है। न्याय की टीकाओं के माध्यम से यह समझाया गया है कि व्याप्ति का निश्चय 'भूयोदर्शन' और 'तर्क' से होता है, जो कि संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा के साक्ष्य-आधारित परीक्षण के समकक्ष है। द्वितीय चरण में, तर्कसंग्रह में वर्णित 'हेत्वाभास' (दोषपूर्ण तर्क) और संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा में वर्णित 'वैचारिक विकृति' के मध्य गहन समानताएँ स्थापित की गई हैं। 'सव्यभिचार' को अति-सामान्यीकरण और 'बाधित' को वास्तविकता से कटे हुए विचारों के रूप में विश्लेषित किया गया है। शोध में 'सिद्धान्तचन्द्रोदय' की 'उपाधि' अवधारणा का प्रयोग करते हुए यह सिद्ध किया गया है कि कैसे मानसिक पूर्वाग्रह हमारी तर्क प्रक्रिया को दूषित करते हैं। अंततः, शोध यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि 'न्यायसिद्धान्तमुक्तावली' में वर्णित तत्त्वज्ञान की प्रक्रिया और संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा की वैचारिक परिशोधन प्रक्रिया दोनों का गंतव्य एक ही है - भ्रम का नाश और यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति। यह शोध प्राचीन भारतीय तार्किक परंपरा की प्रासंगिकता को समकालीन नैदानिक मनोविज्ञान के धरातल पर पुनर्स्थापित करता है।

Fields of Study & Subjects

Psychological Treatments and Assessments Indian and Buddhist Studies Philosophy and Theoretical Science

Publication details

Journal / source
International Journal of Sanskrit Research
Volume
12
Issue
1
Pages
167–170
Publication date
1 January 2026