गरखनथ परपर म हठयग क सशकत आतम बध परकरय
Abstract
गोरखनाथ परम्परा में हठयोग केवल शारीरिक अभ्यास नहीं है बल्कि यह आत्मबोध की सशक्त अनुशासित और क्रमिक प्रक्रिया है। इसे काया साधना के माध्यम से तन्त्र-साधना तक की यात्रा माना गया है। गोरखवाणी में कहा गया है-गोरखनाथ के अनुसार जब तक उच्च आध्यात्मिक अनुभूति संभव नहीं। इस हठयोग मे षट्कर्म, आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बन्ध, नाड़ी-शोधन को अत्यन्त आवश्यक माना गया है। हठयोग प्रदीपिका में स्पष्ट कहा गया है। हठयोग ही राजयोग की सीढ़ी है। इसमें कोई सन्देह नहीं शरीर की दैहिक आसक्ति से मुक्ति, प्राण शक्ति के परिशोधन मन की चञ्चलता के निरोध एवं समाधि की अग्रसर होने का एक वैज्ञानिक, व्यवस्थित और प्रयोगात्मक साधन है। राजयोग जहाँ लक्ष्य है, वहीं हठयोग उस लक्ष्य तक पहुँचने का व्यावहारिक मार्ग है। इसी कारण आज के युग में मानव-कल्याण के लिए हठयोग की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। भारतीय योग परम्परा में हठयोग एवं राजयोग को परस्पर पृथक् अथवा विरोधी साधनाएं मानना योगदर्शन की मूल आत्मा के प्रतिकूल हैं। हठयोग की अपनी कुछ विशेषताएँ, प्रभाव और कथाएं हैं जो कि अपने आप में योग को पूरा करती है। गोरखनाथ के अनुसार जब तक शरीर शुद्ध नहीं होता तब तक उच्च आध्यात्मिक अनुभूति संभव नहीं है। इसलिए हठयोग में षट्कर्म, आसन, प्राणायाम्, मुद्रा, बन्ध, नाड़ी-शोधन को आवश्यक मानते हुए योगदर्शन में भी कहा गया है। योगश्चिŸावृत्ति निरोधः अर्थात् योग से चित्त की वृत्ति का निरोध होता है।
Fields of Study & Subjects
Indian and Buddhist Studies
Traditional Chinese Medicine Studies
Religious Studies and Spiritual Practices
Publication details
- Journal / source
- International Journal of Sanskrit Research
- Volume
- 12
- Issue
- 1
- Pages
- 257–260
- Publication date
- 1 January 2026
- Language
- HI