अभजञनशकतलम म नरपत परकतक सदरय

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Authors: रेखा कुमारी
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Abstract

महाकवि कालिदास संस्कृत साहित्य के उन विलक्षण कवियों में गिने जाते हैं जिनकी कृतियाँ न केवल भारतीय परंपरा बल्कि विश्व साहित्य में भी अमूल्य धरोहर के रूप में प्रतिष्ठित हैं । वे भारतीय संस्कृति, मानवीय भावनाओं तथा विशेष रूप से प्रकृति के अद्वितीय मर्मज्ञ और सहृदय द्रष्टा माने जाते हैं ।कालिदास के काव्य में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि या सौंदर्य-वर्धक उपकरण नहीं है, बल्कि वह एक जीवंत, संवेदनशील और सक्रिय पात्र के रूप में उपस्थित होती है । प्रकृति को मनुष्यों की भाँति भावनाओं का सहभागी मानना उनके काव्य की विशेषता है, जिसे संस्कृत साहित्य में मानवीकरण या सहृदयता कहा गया है ।अभिज्ञानशाकुंतलम् में शकुंतला के जीवन में प्रकृति उसकी संरक्षिका, सखी और भावनाओं की अनुगामिनी के रूप में चित्रित होती है । आश्रम का शांत वातावरण, कल-कल बहते झरने, वृक्षों की छाया, लताओं की कोमलता और मृगों की सहजता-ये सभी तत्व शकुंतला के अस्तित्व में विलीन हैं । प्रकृति उसके जीवन और भावनाओं के साथ पूर्ण सामंजस्य स्थापित करती है ।कालिदास के अभिज्ञानशाकुंतलम् में अन्तः प्रकृति और वाह्य प्रकृति का सुंदर मिश्रण दिखाई पड़ता है । यह नाटक मानव और प्रकृति के सौहार्दपूर्ण संबंध का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहाँ प्रकृति मानवीय संवेदनाओं का दर्पण बन जाती है । प्रसिद्ध जर्मन कवि गेटे ने भी इस नाटक की प्रशंसा करते हुए कहा कि इसमें

Fields of Study & Subjects

Indian and Buddhist Studies Poetry Analysis and Criticism Ecocriticism and Environmental Literature

Publication details

Journal / source
International Journal of Sanskrit Research
Volume
12
Issue
1
Pages
268–272
Publication date
1 January 2026
Language
HI