जमई जल म सतत कष क परतसहत करन हत कष पदधतय तथ भम उपयग म ह रह परवरतन क भगलक वशलषण
Abstract
भारत कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था वाला देश है, जहाँ अधिकांश ग्रामीण आबादी की जीविका खेती पर टिकी हुई है। बिहार का जमुई जिला इसी पृष्ठभूमि में विशेष महत्त्व रखता है। यहाँ पारंपरिक कृषि पद्धतियों की मजबूत परंपरा रही है, परंतु हाल के वर्षों में खेती में आधुनिक तकनीकों को अपनाने की गति तेज हुई है। इस परिवर्तन ने भूमि उपयोग की संरचना को भी प्रभावित किया है, जिसके परिणामस्वरूप कृषियोग्य भूमि में कमी तथा सतत कृषि के लिए नई चुनौतियाँ उभरकर सामने आई हैं। इस शोध में जमुई जिले में भूमि उपयोग के बदलते रुझानों और कृषि तकनीकों के विकास का भौगोलिक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इसमें पारंपरिक उपाय, जैसे मिश्रित खेती, जैविक खादों का उपयोग, तथा दक्षिण बिहार की प्रसिद्ध आहर-पाइन जल प्रबंधन प्रणाली तथा आधुनिक तकनीकों जैसे रासायनिक उर्वरक, कृषि मशीनरी, और उच्च उत्पादक किस्में—इन दोनों के प्रभावों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से ज्ञात हुआ कि जहाँ पारंपरिक पद्धतियाँ मृदा की दीर्घकालिक उर्वरता, जल संरक्षण और जैव विविधता को बनाए रखने में समर्थ हैं, वहीं आधुनिक पद्धतियाँ त्वरित उत्पादन वृद्धि तो सुनिश्चित करती हैं, किंतु मृदा और जल संसाधनों पर प्रतिकूल प्रभाव भी डालती हैं। इन विरोधाभासी प्रवृत्तियों को संतुलित करने हेतु शोध यह सुझाव देता है कि सतत कृषि के लिए स्थानीय पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का समन्वित उपयोग आवश्यक है। ऐसा मॉडल पर्यावरणीय संरक्षण को मजबूती देगा और किसानों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में भी सुधार लाएगा।
Fields of Study & Subjects
Agricultural Economics and Practices
Agriculture
Land Use
Rural Development
Indigenous Knowledge Systems and Agriculture
Publication details
- Journal / source
- International Journal of Geography Geology and Environment
- Volume
- 8
- Issue
- 1
- Pages
- 63–67
- Publication date
- 1 January 2026