औपनवशक कल म अनय पछड वरग: आरकषण स परव समजक-आरथक उपकष क मलयकन

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Authors: धर्मेन्द्र कुमार, सैय्यद रज़ा
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Abstract

यह शोध पत्र भारतीय समाज में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की आरक्षण से पूर्व की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक उपेक्षा का गहन मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। जाति व्यवस्था को मूल कारण मानते हुए, लेखक दर्शाते हैं कि ओबीसी जातियां, जैसे लोहार, कुम्हार, नाई आदि, वंशानुगत पेशों से बंधी रहीं, जहां शारीरिक श्रम को हीन माना गया, जबकि ब्राह्मणों को मानसिक श्रम की प्रतिष्ठा प्राप्त थी। सामाजिक सम्मान की कमी, आर्थिक वंचना, शिक्षा से बहिष्कार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की अनुपस्थिति को उदाहरणों से स्पष्ट किया गया है, जैसे 1892-1944 के बीच आईसीएस और विश्वविद्यालयों में ब्राह्मणों का प्रभुत्व। औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों द्वारा प्रदान की गई नौकरियां और दुकानें ओबीसी के आत्मविश्वास को बढ़ाने में सहायक रहीं, लेकिन जातीय बंधन आज भी व्यवसाय और राजनीति में बाधक हैं। मनुस्मृति जैसे शास्त्रों का हवाला देकर लेखक तर्क देते हैं कि ओबीसी को धन-संग्रह से वंचित रखा गया। स्वतंत्रता के बाद भी निजी शिक्षा संस्थानों में असमानता बनी रही। अंत में, लेखक ओबीसी को जनशक्ति के माध्यम से राजनीतिक अधिकार छीनने की आवश्यकता पर जोर देते हैं, क्योंकि सवर्ण वर्चस्व आसानी से नहीं टूटेगा। यह अध्ययन ओबीसी की विरासत को समझने और सामाजिक न्याय की दिशा में योगदान देता है।

Fields of Study & Subjects

South Asian Studies and Diaspora South Asian Studies and Conflicts Indian Economic and Social Development

Publication details

Journal / source
International Journal of History
Volume
8
Issue
2
Pages
110–113
Publication date
1 February 2026
Language
HI