मरयकल म मजदर क दश
Abstract
मौर्यकाल में मजदूरों की स्थिति मिश्रित और जटिल थी। इस युग में श्रम का अधिकांश कार्य दासों, शूद्रों और वेतनभोगी श्रमिकों द्वारा किया जाता था। कृषक, शिल्पी, और घरेलू सेवाओं में लगे मजदूर समाज की आर्थिक संरचना का आधार थे, किंतु उनकी सामाजिक स्थिति निम्न मानी जाती थी। दास प्रथा प्रचलित थी, जिसमें दास मजदूर स्वामी के अधीन कार्य करते थे और उनका जीवन स्वतंत्रता से वंचित होता था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दासों की सुरक्षा के कुछ प्रावधान मिलते हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि राज्य ने उनकी दशा सुधारने का प्रयास किया। वेतनभोगी मजदूरों को कार्य के अनुसार मजदूरी मिलती थी—कभी नकद, कभी अनाज या वस्तु के रूप में। कृषि मजदूर उपज का एक निश्चित हिस्सा पारिश्रमिक के रूप में पाते थे। हालांकि वेतन और अधिकारों के नियम बने थे, फिर भी श्रमिकों के शोषण की संभावना बनी रहती थी। कठोर श्रम और निम्न सामाजिक स्थिति के कारण मजदूरों का जीवन कठिन था।शिल्प और उद्योगों के विकास से मजदूरों को रोजगार मिला, विशेषकर धातु, वस्त्र और निर्माण उद्योगों में। भवन निर्माण, कृषि उपकरण निर्माण, और वस्त्र उद्योग में श्रमिकों का योगदान महत्वपूर्ण रहा। राज्य द्वारा कुछ संरक्षण और नियमन भी किया गया, जिससे श्रमिकों के हितों की रक्षा का प्रयास दिखाई देता है। कुल मिलाकर, मौर्यकाल में मजदूर अर्थव्यवस्था के आधार थे, परंतु उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति सीमित थी। सुधार के कुछ प्रयास हुए, किंतु पूर्ण समानता और स्वतंत्रता का अभाव बना रहा। यह युग श्रम और उत्पादन के विस्तार का था, पर श्रमिकों की दशा आधुनिक मानकों से काफी निम्न थी।
Fields of Study & Subjects
Indian and Buddhist Studies
South Asian Studies and Diaspora
Classical Antiquity Studies
Publication details
- Journal / source
- International Journal of History
- Volume
- 8
- Issue
- 2
- Pages
- 139–142
- Publication date
- 1 February 2026
- Language
- HI