उततर भरत क कसन आदलन म ससकतक अभवयकत क भमक (1920–1947): लकगत स लकर परतकवद तक

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Authors: प्रियांशु श्रीवास्तव, हेमंत पाल
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Abstract

यह शोध-पत्र 1920 से 1947 के बीच उत्तर भारत के किसान आंदोलनों में सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की केंद्रीय भूमिका का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण, स्थायी बंदोबस्त और उच्च लगान दरों के विरुद्ध उठे अवध, बिजौलिया और पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान संघर्षों में लोकगीतों, लोकनाट्य, धार्मिक प्रतीकों और मौखिक परंपराओं ने राजनीतिक प्रतिरोध को व्यापक जनाधार और वैचारिक गहराई प्रदान की। बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में तुलसीदास की रामायण के छंदों, 'सीता-राम' नारे और नौटंकी के सांस्कृतिक रूपांतरण ने जमींदारों को 'रावण' के रूप में प्रस्तुत कर जनचेतना जागृत की। खादी-चरखा, शंखनाद और धार्मिक मिथकों के पुनर्पाठ ने गांधी को दैवीय शक्ति के रूप में स्थापित करने से आंदोलन को धार्मिक वैधता और आत्मनिर्भरता की भावना दी। शाहिद अमीन और कपिल कुमार के अध्ययन प्रमाणित करते हैं कि मौखिक इतिहास और 'चमत्कारों' की अफवाहों ने किसानों को मनोवैज्ञानिक बल प्रदान किया, जिससे सांस्कृतिक प्रतिरोध किसान आंदोलनों की सफलता का आधार बना और राजनीतिक संघर्ष सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण में परिवर्तित हुआ।

Fields of Study & Subjects

South Asian Studies and Diaspora Colonial History and Postcolonial Studies Cultural History and Identity Formation

Publication details

Journal / source
International Journal of History
Volume
8
Issue
2
Pages
143–146
Publication date
1 February 2026
Language
HI