परयर क समजक-रजनतक चतन: आधनकत, समनत और परतरध क दरशनक परयजन

Read full text
Authors: मिथिलेश विश्वास
Cited by: 0

Abstract

यह शोध-पत्र ई. वी. रामासामी ‘पेरियार’ के सामाजिक-राजनीतिक चिंतन का दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है और उन्हें भारतीय सामाजिक सुधार परंपरा के भीतर एक मौलिक तथा उग्र वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में स्थापित करता है । पेरियार का चिंतन परंपरा, धर्म और जाति-आधारित असमानताओं की सतही आलोचना तक सीमित न होकर उन संरचनात्मक आधारों को चुनौती देता है, जिनके माध्यम से सामाजिक वर्चस्व को नैतिक और सांस्कृतिक वैधता प्राप्त होती रही है । यह लेख तर्क देता है कि पेरियार का वैचारिक योगदान केवल सामाजिक सुधार की परियोजना नहीं था, बल्कि आधुनिकता, समानता और प्रतिरोध पर आधारित एक समग्र दार्शनिक दृष्टि थी ।पेरियार की आधुनिकता की संकल्पना पश्चिमीकरण या तकनीकी प्रगति से भिन्न है; वह विवेक, आलोचनात्मक चेतना और आत्मसम्मान को सामाजिक नैतिकता के मूल सिद्धांत के रूप में स्थापित करती है । समानता उनके लिए केवल संवैधानिक या कानूनी अधिकारों का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों, सांस्कृतिक प्रतीकों और दैनिक व्यवहारों के पुनर्गठन की मांग है । इसी प्रकार, प्रतिरोध उनके चिंतन में नकारात्मक विद्रोह या तात्कालिक असहमति नहीं, बल्कि दमनकारी सामाजिक-राजनीतिक संरचनाओं के विघटन की एक सृजनात्मक और नैतिक राजनीति के रूप में प्रकट होता है ।यह शोध-पत्र पेरियार के सामाजिक-राजनीतिक चिंतन को भारतीय राजनीतिक दर्शन की एक वैकल्पिक, आलोचनात्मक और प्रायः हाशिये पर रखी गई परंपरा के रूप में पुनर्पाठ करने का प्रयास करता है, जो सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा और विवेकपूर्ण लोकतंत्र की पुनर्कल्पना के लिए आज भी गहरी प्रासंगिकता रखती है ।

Fields of Study & Subjects

South Asian Studies and Diaspora Indian History and Philosophy Religion and Society Interactions

Publication details

Journal / source
International Journal of Political Science and Governance
Volume
8
Issue
2
Pages
58–62
Publication date
1 February 2026