गधवद आरथक दरशन और सतत वकस क समकलन परसगकत
Abstract
महात्मा गांधी का आर्थिक दर्शन मूलतः उस धारणा को चुनौती देता है जिसमें अर्थव्यवस्था को केवल उत्पादन की वृद्धि और उपभोग के विस्तार के रूप में समझा जाता है। गांधी के लिए अर्थशास्त्र नैतिकता से पृथक कोई तकनीकी अनुशासन नहीं था, बल्कि वह मानव–जीवन के मूल्यों से गहराई से जुड़ा हुआ था। उनका मानना था कि ऐसी अर्थव्यवस्था, जो मानव–गरिमा, श्रम–सम्मान और सामाजिक समता की उपेक्षा करती है, अंततः समाज को विघटन की ओर ले जाती है। इसलिए गांधी का आर्थिक चिंतन मानव–केंद्रित है, जिसमें लाभ की अधिकतमता के स्थान पर समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण को प्राथमिकता दी जाती है। इस दृष्टि से उनका दर्शन सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता का नैतिक आधार प्रस्तुत करता है। आधुनिक विश्व में आर्थिक विकास की प्रचलित अवधारणा ने भले ही तकनीकी प्रगति और भौतिक समृद्धि को बढ़ाया हो, किंतु इसके दुष्परिणाम भी उतने ही गंभीर रूप में सामने आए हैं। पर्यावरणीय क्षरण, संसाधनों का अत्यधिक दोहन, बढ़ती आर्थिक विषमता और सामाजिक असंतोष इस विकास मॉडल की सीमाओं को उजागर करते हैं। ऐसे संदर्भ में गांधीवादी आर्थिक दर्शन एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रदान करता है, जो प्रकृति के साथ सामंजस्य, सीमित उपभोग और नैतिक आत्म–संयम पर आधारित है। गांधी का यह विचार कि विकास का उद्देश्य मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति होना चाहिए, न कि अनियंत्रित लालच, सतत विकास की समकालीन अवधारणा से सीधे जुड़ता है। गांधीवादी आर्थिक दर्शन के प्रमुख तत्व—न्यासिता, श्रम–गरिमा, स्वदेशी, विकेंद्रीकरण और सीमित उपभोग—आज के वैश्विक आर्थिक संकटों के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत प्रदान करते हैं। न्यासिता संपत्ति के सामाजिक उत्तरदायित्व को रेखांकित करती है, श्रम–गरिमा उत्पादन प्रक्रिया को मानवीय बनाती है, जबकि स्वदेशी और विकेंद्रीकरण स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को सुदृढ़ कर पर्यावरणीय दबाव को कम करते हैं। सीमित उपभोग की अवधारणा उपभोक्तावाद की आलोचना करते हुए संसाधनों के न्यायपूर्ण और संतुलित उपयोग पर बल देती है। इस प्रकार गांधी का आर्थिक दर्शन न केवल ऐतिहासिक महत्व रखता है, बल्कि समकालीन सतत विकास की चुनौतियों के संदर्भ में भी अत्यंत प्रासंगिक और मार्गदर्शक सिद्ध होता है।
Fields of Study & Subjects
Indian History and Philosophy
Historical Economic and Legal Thought
Indian Economic and Social Development
Publication details
- Journal / source
- International Journal of Humanities and Education Research
- Volume
- 8
- Issue
- 1
- Pages
- 18–22
- Publication date
- 1 January 2026