गध स एकतम मनववद तक: दन दयल उपधयय क दरशन क वचरक नरतरत और भननत
Abstract
बीसवीं शताब्दी का भारतीय राजनीतिक चिंतन केवल औपनिवेशिक शासन के प्रतिरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने पश्चिमी आधुनिकता, औद्योगिक सभ्यता और भौतिकतावादी विकास मॉडल की गहन नैतिक आलोचना भी प्रस्तुत की । इस बौद्धिक परंपरा में महात्मा गांधी और पंडित दीन दयाल उपाध्याय दो ऐसे चिंतक हैं, जिन्होंने भारतीय संदर्भ में वैकल्पिक सामाजिक-राजनीतिक दर्शन प्रस्तुत किया । जहाँ गांधी ने सत्य और अहिंसा पर आधारित एक सार्वभौमिक नैतिक राजनीति की परिकल्पना की, वहीं दीन दयाल उपाध्याय ने स्वतंत्र भारत के संदर्भ में ‘एकात्म मानववाद’ के माध्यम से सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी और समन्वित विकास दृष्टि विकसित की । यह लेख गांधी दर्शन और एकात्म मानववाद के बीच वैचारिक निरंतरता और भिन्नताओं का विश्लेषण करता है । लेख का तर्क है कि एकात्म मानववाद, गांधीवादी नैतिक आलोचना से प्रेरणा ग्रहण करता है, किंतु उसे भारतीय राष्ट्र-राज्य और सांस्कृतिक चेतना के ढाँचे में पुनर्संरचित करता है । समकालीन भारत में विकास, राष्ट्रवाद और नैतिक राजनीति की बहसों के संदर्भ में यह अध्ययन विशेष प्रासंगिकता रखता है ।
Fields of Study & Subjects
Military Technology and Strategies
Legal and Regulatory Analysis
Linguistic
Cultural
and Literary Studies
Publication details
- Journal / source
- International Journal of Social Science and Education Research
- Volume
- 8
- Issue
- 1
- Pages
- 01–04
- Publication date
- 1 January 2026