परचन भरत म परवहन क परमख सधन (बदध सहतय क वशष सदरभ म)

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Authors: पिंकी गुप्ता
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Abstract

प्राचीन भारत में परिवहन के साधनों का विकास मानव सभ्यता की प्रगति का द्योतक है । उस समय परिवहन केवल भौतिक गतिशीलता का साधन नहीं था, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन का आधार भी था । व्यापारिक मार्गों पर वस्तुओं का आदान-प्रदान, राजकीय और सैन्य अभियानों की सफलता, धार्मिक यात्राओं का विस्तार तथा सांस्कृतिक संपर्क इन सभी में परिवहन साधनों की केंद्रीय भूमिका रही । परिवहन" शब्द दो भागों से बना है – “परि” = चारों ओर या सभी दिशाओं में “वहन” = ले जाना, ढोना या स्थानांतरित करना इस प्रकार परिवहन का अर्थ है वस्तुओं, व्यक्तियों या संसाधनों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने की क्रिया । चुल्लवग्ग में यानशब्द का उल्लेख मिलता हैं जिसे याति-यायेन भी कहा गया है ।1 दीघनिकाय में हस्तियान, अश्वयान, दिव्ययान का वर्णन मिलता है ।2 यान सभी प्रकार के परिवहन के लिए उपयोग में लाया जाता था, यथा यात्री गाड़ी, पशु को ले जाने वाली गाड़ी तथा माल ढ़ोने वाली गाड़ी इत्यादि । सभी गाड़ियों का उपयोग सामान ढ़ोने तथा यात्रा के लिए किया जाता था । पाराजिक में यानट्ठ शब्द आया है जिसका अभिप्राय यान में लादे माल से लगाया जाता है । प्रारम्भ में मनुष्य स्वयं भार वहन (ढ़ोने) का साधन था और ये भार ढ़ोने के लिए अपने हाथ या सर का प्रयोग करता था। समय परिवर्तन के साथ-साथ अपने सुविधा के लिए निरंतर आवश्यकता का अनुभव कर मानव ने परिवहन के साधनों का खोज किया तथा भार वहन करने के लिये पशुशक्ति का उपयोग करना प्रारम्भ किया । इस प्रकार पशु परिवहन का साधन बना तथा मानव व पशुशक्ति दोनों परिवहन के प्रमुख साधन बन गये परन्तु बाद के कालों में व्यापार की उन्नति के साथ-साथ परिवहन के साधनों में और भी उन्नति हुयी । मनुष्य एवं पशुओं के परिवहन क्षमता में वृध्दि करने के लिए कुछ प्राविधिक सुविधाएँ धीरे-धीरे उपयोग में लायी जाने लगीं । मनुष्य के इस अनुभव ने उसे प्रोत्साहित किया कि वह और अधिक भार को खींचकर अथवा किसी पट्ट पर रखकर आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जा सके यथा बैलगाड़ी, रथ इत्यादि का उपयोग प्रारम्भ हुआ । प्राचीन भारत में परिवहन के रूप में स्थल व जल दोनों मार्गों का उपयोग किया जाता था । स्थलीय मार्गों में जिन साधनों का उपयोग होता, उनमें बैलगाड़ी, रथ, पालकी, बहँगी, हत्थवट्टक जैसे मानव-निर्मित साधन प्रचलित थे । भारवाही पशुओं में बैल, घोड़ा, गदहा, खच्चर, बकरी, भेड़ तथा ऊँट इत्यादि थे तथा जलीय साधनों में नाव व इसके विभिन्न छोटे-बड़े प्रकार का प्रयोग किया जाता था। इसपर सामान लादकर व्यापार करने का उल्लेख मिलता हैं। भौगोलिक विविधता के अनुसार साधनों का चयन किया जाता था । मैदानी क्षेत्रों में बैलगाड़ी और रथ, पहाड़ी क्षेत्रों में खच्चर और मानव श्रम, तथा रेगिस्तानी क्षेत्रों में ऊँट प्रमुख साधन थे। इस प्रकार प्राचीन भारत के परिवहन साधन केवल आवागमन की सुविधा तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे उस युग की आर्थिक समृद्धि, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सभ्यता के विस्तार के मूल आधार थे ।

Fields of Study & Subjects

Military Technology and Strategies Legal and Regulatory Analysis Linguistic Cultural and Literary Studies

Publication details

Journal / source
International Journal of Social Science and Education Research
Volume
8
Issue
1
Pages
20–27
Publication date
1 January 2026