कवत म नर सवर
Abstract
कविता में ’नारी स्वर’ अर्थात् नारी की चेतना, उसकी अनुभूतियाँ, आकांक्षाएं, पीड़ाएं, आत्मस्वर, विद्रोह एवं उसकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति से जुड़े भावों का काव्यात्मक रूप। भारतवर्ष में वैदिक काल से ही स्त्रियाँ सभ्यता के विकास में समान सहयोगी के रूप में अपना योगदान देती आ रही है। किन्तु जब उसके अधिकारों के सम्बन्ध में अपेक्षाकृत असमानता का रूप प्रभावी होने लगता है तब साहित्य और समाज में नारी स्वर बुलंद होने लगते हैं। “तुम भूल गये पुरुषत्व मोह में कुछ सत्ता है नारी की, समरसता है सम्बन्ध बनी अधिकार और अधिकारी की।” जब इस अकाट्य सत्य को भूल पुरुष-प्रधान समाज की संरचनाओं में नारी परतंत्र, मौन और सीमित भूमिकाओं तक बांध दी जाती है तो समाज की यह आधी आबादी भी मुक्त गगन में उड़ान भरना चाहती है। उनकी यह चाहत कविता में नारी स्वर के रूप में शब्दबद्ध होते है। चूँकि कविता एक रागात्मक एवं लयात्मक अभिव्यंजना होती है इसलिए इस विधा में नारी स्वर के गीत विभिन्न रूपों में कलमबद्ध होने लगे। इसमें हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल से लेकर समकालीन कविता तक नारी स्वर के विविध रूप, जो करुणा और भक्ति से शुरू होकर स्त्री अस्मिता, विद्रोह और आत्मस्वीकार तक की यात्रा तय करते हुए हिन्दी कविता को एक नया क्षितिज प्रदान किया। कविता में नारी स्वर ने नारी के आत्मान्वेषण की प्रक्रिया को पूरा करने में मार्गदर्शन का कार्य किया। स्त्री अब सामाजिक बंधनों से मुक्त होकर मातृत्व प्रेम और मानवीय दृष्टि के आलोक में अन्याय एवं शोषण के खिलाफ आवाज उठाने का साहस करने लगी। आज की नारी केवल स्त्री मात्र का नहीं, बल्कि पूरे समाज की मानवीय चेतना का प्रतिनिधित्व करती है। यह स्वर स्वतंत्रता, समानता और न्याय के मौलिक अधिकारों की मांग करती है।
Fields of Study & Subjects
Poetry Analysis and Criticism
Gender and Feminist Studies
Literature: history
themes
analysis
Publication details
- Journal / source
- International Journal of Advanced Academic Studies
- Volume
- 8
- Issue
- 1
- Pages
- 114–116
- Publication date
- 1 January 2026