परचन भरत म गधक - तलक वयपर वरग : एक ऐतहसक अनशलन
Abstract
प्राचीन भारत में गंधिक तैलिक व्यापारिक वर्ग का विकास पांचवी-चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर कुषाण सातवाहन काल तक गंध एवं तैल व्यवसाय विकास की चरम अवस्था में पहुंच गया था। सर्वप्रथम इसका उल्लेख दिव्यावदान में मिलता हैं । जिसे पालि साहित्य में खालिकचक्र कहा गया है। पाणिनी कृत, अष्टाध्यायी, दिव्यावदान, मिलिंदपन्हों, महाभारत, महावस्तु इत्यादि ग्रंथों में गधिंक तैलिक श्रेणियों का उल्लेख मिलता है। इस काल के अभिलेखों में भी गंधिक-तैलिक श्रेणी को मिलाकर उत्तर भारतीय नगरों में विकास मान कुल सत्रह श्रेणियों के नाम मिलते हैं। भारतीय धनी व्यक्ति एवं नारी वर्ग इन सुगंधित तेल एवं इत्र का प्रयोग रुचिपूर्वक किया करते थे। सुगंधित द्रव्यों से अपने वस्त्रों को भी सुवासितत किया करते थे।
Fields of Study & Subjects
Military Technology and Strategies
Legal and Regulatory Analysis
Linguistic
Cultural
and Literary Studies
Publication details
- Journal / source
- International Journal For Multidisciplinary Research
- Volume
- 8
- Issue
- 1
- Publication date
- 1 January 2026