हडत परदश म भतत चतरकल क ऐतहसक अधययन

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Authors: Rekha Bairwa
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Abstract

हाड़ौती प्रदेश - बूंदी, कोटा, झालावाड़ सिम्मलत क्षेत्र - राजस्थान का चौहान राजवंशीय सांस्कृ तक केंद्र है। यहाँ भत्त चत्रकला का वकास प्रागैतहासक तलस्वाड़ी गुफा चत्रों से प्रारंभ होकर मध्यकालीन राजपूत शैली में परपक्व हुआ। 13वीं शताब्दी में राव देवा द्वारा बूंदी स्थापना के साथ कला संरक्षण प्रारंभ हुआ, कंतु स्वतंत्र हाड़ौती शैली का प्रथम प्रमाण राव सुरजन संह (1554-1585) के काल का है।1569 ई. में रणथंभौर अकबर को सौंपने के पश्चात् सुरजन ने उत्तर प्रदेश के चुनार कले में रागमाला भत्त चत्र बनवाए, जो हाड़ौती शैली के प्रारंभिक दस्तावेज हैं। 17वीं शताब्दी में बूंदी के शत्रुसाल (1631-1658) ने रंगमहल बनवाया, जहाँ राग-रागनी एवं नायक-नायका भेद चत्रत हैं। भाव संह (1658-1681) के काल में चत्र महल एवं फूल महल में मतीराम रचत 'रस राज' तथा 'ललत लल्लम' के चत्र बने।18वीं शताब्दी हाड़ौती भत्त चत्रकला का स्वणम युग था। बू ंदी के उम्मेद संह (1748-1770) ने 1760 ई. में चत्रशाला बनवाई - 12 कमरों, 500 से अधक फ्रेस्को। कोटा में 1631 ई. शाहजहाँ द्वारा प्राप्त प्रांत में राम संह प्रथम (1696-1705) ने स्वतंत्र शैली प्रारंभ की। भीम संह (1707-1720) ने वल्लभ भिक्त प्रभाव से कृष्ण लीला चत्रण बढ़ाया। उम्मेद संह कोटा (1762-1819) के शासनकाल में शकार दृश्यों ने चरमोत्कष प्राप्त कया। 19वीं शताब्दी में टश प्रभाव से राम संह द्वतीय (1821-1866) काल में यूरोपीय शैली मश्रण हुआ।

Fields of Study & Subjects

Indian and Buddhist Studies Historical Art and Architecture Studies Archaeology and Rock Art Studies

Publication details

Journal / source
International Journal For Multidisciplinary Research
Volume
8
Issue
1
Publication date
17 February 2026
Language
HI