परमचदततर हद उपनयस म गरमण-शहर वभजन क चतरण
Abstract
प्रेमचंदोत्तर काल में हिंदी उपन्यास ने भारतीय समाज की जटिलताओं को उजागर किया है, विशेष रूप से ग्रामीण-शहरी विभाजन को। यह शोध पत्र उदय प्रकाश, संजीव और गीतांजलि श्री जैसे लेखकों के चुने हुए उपन्यासों का विश्लेषण करता है, जहाँ ग्रामीण जीवन की सादगी, संघर्ष और शहरीकरण के प्रभाव को चित्रित किया गया है। प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ये लेखक आधुनिक भारत की आर्थिक असमानता, प्रवासन, सांस्कृतिक टकराव और पहचान के संकट को दर्शाते हैं। उदय प्रकाश के 'मोहनदास' में ग्रामीण व्यक्ति की शहरी व्यवस्था में हाशियाकरण, संजीव के 'जंगल जहाँ शुरू होता है' में आदिवासी-शहरी टकराव, और गीतांजलि श्री के 'रेत समाधि' में विभाजन की स्मृतियाँ और शहरी जीवन की जटिलताएँ प्रमुख हैं। यह पत्र दर्शाता है कि ग्रामीण-शहरी विभाजन न केवल भौगोलिक है बल्कि सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक भी है, जो वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण के संदर्भ में बढ़ा है। विश्लेषण से पता चलता है कि ये उपन्यास सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक संरक्षण की माँग करते हैं।
Fields of Study & Subjects
South Asian Studies and Diaspora
Literature: history
themes
analysis
Postcolonial and Cultural Literary Studies
Publication details
- Journal / source
- International Journal of Advanced Research in Science Communication and Technology
- Pages
- 586–586
- Publication date
- 12 January 2026