भरतय जञन परपर और नरगण कवयधर

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Authors: डॉ. बृजेन्द्र कुशवाहा
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Abstract

भारतीय ज्ञान परंपरा एक प्राचीन और समृद्ध विरासत है जो वेदों, उपनिषदों, दर्शनशास्त्रों और भक्ति साहित्य से जुड़ी हुई है। निर्गुण काव्यधारा, जो भक्ति काल की एक प्रमुख शाखा है, इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह काव्यधारा निर्गुण ब्रह्म की उपासना पर आधारित है और संत कवियों जैसे कबीर, रैदास और नानक द्वारा प्रतिपादित है। इस शोध पत्र में भारतीय ज्ञान परंपरा और निर्गुण काव्यधारा के बीच के संबंधों का विश्लेषण किया गया है, जिसमें दार्शनिक आधार, सामाजिक प्रभाव और साहित्यिक योगदान पर ध्यान केंद्रित है। शोध से पता चलता है कि निर्गुण काव्य भारतीय ज्ञान परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है, जो आत्मज्ञान, समानता और भक्ति के माध्यम से समाज को प्रभावित करता है।

Fields of Study & Subjects

Indian and Buddhist Studies Cultural and Mythological Studies South Asian Studies and Diaspora

Publication details

Journal / source
International Journal of Advanced Research in Science Communication and Technology
Pages
288–288
Publication date
18 January 2026