भरतय जञन-परमपर म शकरनत क यगदन

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Authors: अमिता सिंह
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Abstract

भारतीय ज्ञान-परम्परा हमारे प्राचीन आचार्यों द्वारा रोपित वह वृक्ष है जिसकी शाखाएँ वेद, वेदांग, उपनिषद्, पुराण, इतिहास, स्मृतिग्रन्थ, नीतिग्रन्थ के रूप में पुष्पित व पल्लवित हो रही हैं। इसी बौद्धिक और दार्शनिक परम्परा में शुक्राचार्य प्रणीत शुक्रनीति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अन्य सभी शास्त्र व्यावहारिक जगत् के किसी एक भाग का वर्णन करते हैं, किन्तु सार्वजनिक हित एवं सामाजिक सुरक्षा का बन्धकत्व यह नीतिशास्त्र ही देता है। क्योंकि धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप पुरुषार्थ चतुष्टय का यह साधक है। इसका ज्ञान प्राप्त करने वाला शासक लोकप्रियता प्राप्त करता है। शुक्रनीति राज्य-संचालन या राजनीति के अतिरिक्त समाज, अर्थव्यवस्था, न्याय-व्यवस्था, दण्ड-विधान, कर-प्रणाली, कूटनीति, शिक्षा, नारी-सम्मान, श्रम और दासप्रथा जैसे विविध पक्षों को समग्र दृष्टि से प्रस्तुत करने वाली रचना है। इसमें राज्य को एक नैतिक संस्था के रूप में देखा गया है, जहाँ शासक का कर्तव्य प्रजा के कल्याण, न्याय और सुरक्षा से जुड़ा है। प्रस्तुत शोधपत्र भारतीय ज्ञान-परम्परा के व्यापक सन्दर्भ में शुक्रनीति के नीतिगत आधारों का विश्लेषण करता है। साथ ही यह स्पष्ट करता है कि इस ग्रन्थ में वर्णित शासन-सिद्धान्त, कूटनीतिक व्यवहार, कर-नीति और सामाजिक न्याय की अवधारणाएँ आधुनिक राज्यशास्त्र और प्रशासनिक चिन्तन से भी संवाद स्थापित करती हैं। समकालीन वैश्विक परिप्रेक्ष्य में, जहाँ सुशासन, नैतिक राजनीति और सामाजिक समावेशन की आवश्यकता बढ़ रही है, ऐसे में शुक्रनीति की शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक और मार्गदर्शक सिद्ध होती हैं।

Fields of Study & Subjects

Indian and Buddhist Studies Cultural and Mythological Studies Traditional Chinese Medicine Studies

Publication details

Journal / source
Anusandhanvallari
Pages
155–168
Publication date
6 January 2026
Language
EN