बजर: हशय क जवन म परम और असमत क महसगरम

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Authors: Sunil Jadhav
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Abstract

भूमिका: हिंदी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार जयशंकर प्रसाद की कहानियाँ केवल घटनाओं का संकलन नहीं, बल्कि मानवीय चेतना के सूक्ष्म तंतुओं की खोज हैं। उनकी कहानी 'बंजारा' एक ऐसे समाज के परिवेश में बुनी गई है, जो अपनी यायावरी (घुमक्कड़ी) और विस्थापन के लिए जाना जाता है। सामान्यतः 'बंजारा' शब्द सुनते ही हमारे मस्तिष्क में धूल भरे रास्ते, बैलों की कतारें और व्यापारिक लाभ-हानि का चित्र उभरता है, किंतु प्रसाद जी ने इस स्थूल आवरण के भीतर धड़कते हुए एक अत्यंत कोमल और स्वाभिमानी हृदय की प्रतिष्ठा की है।यह कहानी उस बिंदु पर केंद्रित है जहाँ प्रेम, सामाजिक मर्यादा और व्यक्तिगत स्वाभिमान आपस में टकराते हैं। भूमिका के रूप में यह समझना आवश्यक है कि कहानी का नायक नन्दू जहाँ 'बाहरी यात्रा' और 'व्यापारिक लाभ' का प्रतीक है, वहीं नायिका मोनी 'आंतरिक रूपांतरण' और 'सात्त्विक प्रेम' की प्रतिनिधि है। यह रचना न केवल औपनिवेशिक काल की प्रशासनिक क्रूरता (चौकीदार के माध्यम से) को उजागर करती है, बल्कि यह भी स्पष्ट करती है कि हाशिये पर रहने वाले समुदायों के भीतर भी नैतिक मूल्य और आत्म-सम्मान की जड़ें कितनी गहरी होती हैं। इस आलेख का उद्देश्य प्रेम, स्वाभिमान और नियति के उस त्रिकोणीय संघर्ष को समझना है, जो इस लघु कलेवर की कहानी को एक महाकाव्यात्मक विस्तार देता है।

Fields of Study & Subjects

Military Technology and Strategies Legal and Regulatory Analysis Linguistic Cultural and Literary Studies

Publication details

Journal / source
Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
Publication date
1 January 2026