मरयकलन भरतय समज म शदर और वशय वरग क समजक सथत : एक ऐतहसक अधययन

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Abstract

मौर्य साम्राज्य के पतन के पश्चात भारत में जो राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन हुए, उन्होंने वर्ण-व्यवस्था की संरचना को गहराई से प्रभावित किया। मौर्योत्तर काल में शुंग, सातवाहन, कुषाण तथा गुप्तवंशीय राज्यों के उदय के साथ समाज में नए वर्गीय संबंधों का विकास हुआ। इस काल में शूद्र और वैश्य वर्ण की सामाजिक स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देते हैं। जहाँ एक ओर ब्राह्मणवादी परंपराओं के पुनरुत्थान के कारण वर्ण-व्यवस्था अधिक सुदृढ़ होती प्रतीत होती है, वहीं दूसरी ओर व्यापार, शिल्प और कृषि के विस्तार ने वैश्य वर्ण को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया। शूद्र वर्ण की स्थिति यद्यपि धार्मिक-सामाजिक दृष्टि से निम्न बनी रही, फिर भी श्रम, सेवा और उत्पादन के क्षेत्रों में उसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। यह शोध-लेख मौर्योत्तर कालीन समाज में शूद्र और वैश्य वर्ण की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति का ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। धर्मशास्त्रों, पुराणों, बौद्ध-जैन साहित्य, अभिलेखों और आधुनिक इतिहासकारों के विचारों के आधार पर यह अध्ययन दर्शाता है कि मौर्योत्तर कालीन समाज स्थिर न होकर गतिशील था, जहाँ वर्ण-व्यवस्था के भीतर भी परिवर्तन और समायोजन की प्रक्रियाएँ सक्रिय थीं।

Fields of Study & Subjects

Military Technology and Strategies Legal and Regulatory Analysis Linguistic Cultural and Literary Studies

Publication details

Journal / source
Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
Publication date
8 January 2026
Language
HI