महलओ क सशकतकरण हत भव नतय एव यजनए: एक समवश और नययपरण दषटकण
Abstract
इक्कीसवीं सदी को यदि मानव अधिकारों, तकनीकी प्रगति और लोकतांत्रिक चेतना के युग के रूप में देखा जाए, तो महिलाओं का सशक्तिकरण इस युग की सबसे केंद्रीय और निर्णायक अवधारणा बनकर उभरता है। किसी भी राष्ट्र की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रगति का वास्तविक आकलन वहाँ की महिलाओं की स्थिति, उनके अधिकारों की सुरक्षा, अवसरों तक समान पहुँच तथा निर्णय–निर्माण प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी के आधार पर किया जाता है। महिलाओं को केवल जनसंख्या का एक वर्ग मानकर नहीं, बल्कि विकास के सक्रिय साझेदार के रूप में देखने की सोच ही किसी समाज को प्रगतिशील और न्यायपूर्ण बनाती है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में महिलाओं की स्थिति ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक कारकों से गहराई से जुड़ी हुई है। स्वतंत्रता के बाद से भारतीय संविधान ने महिलाओं को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार प्रदान किया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और रोजगार के क्षेत्रों में अनेक सकारात्मक पहलें की गई हैं। इसके बावजूद, महिला सशक्तिकरण की प्रक्रिया अभी भी अधूरी और असमान बनी हुई है। आज भी देश के अनेक हिस्सों में महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, संपत्ति अधिकार, रोजगार और सुरक्षा से वंचित रहना पड़ता है। तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य, डिजिटल क्रांति, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, चौथी औद्योगिक क्रांति और वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में केवल परंपरागत कल्याणकारी योजनाएँ पर्याप्त नहीं हैं। आवश्यकता ऐसी भावी, अधिकार–आधारित, तकनीक–समर्थ और समावेशी नीतियों की है, जो महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ–साथ उन्हें सामाजिक निर्णयों का केंद्र बनाएँ। यह शोध–पत्र महिलाओं के सशक्तिकरण हेतु भावी नीतियों और योजनाओं का विश्लेषण प्रस्तुत करता है तथा एक ऐसे न्यायपूर्ण दृष्टिकोण को रेखांकित करता है, जो भारत के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप हो।
Fields of Study & Subjects
Military Technology and Strategies
Legal and Regulatory Analysis
Linguistic
Cultural
and Literary Studies
Publication details
- Journal / source
- Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
- Publication date
- 9 January 2026