मधयकलन भरत म आयरवद और यनन चकतस क समनवय
Abstract
मध्यकालीन भारत, लगभग 6वीं से 18वीं शताब्दी वह दौर था, जब आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा परंपराएँ एक गहरे सांस्कृतिकए दार्शनिक और वैज्ञानिक संवाद के माध्यम से परस्पर समन्वित हुईं। इस अध्ययन में आयुर्वेद के त्रिदोष और पंचमहाभूत सिद्धांत तथा यूनानी चिकित्सा के चार रसए मिज़ाज और अखलात सिद्धांत के तुलनात्मक विश्लेषण द्वारा यह दिखाया गया है कि दोनों प्रणालियाँ स्वास्थ्य को शरीरए मन और प्रकृति के संतुलन की समग्र अवस्था के रूप में परिभाषित करती हैं। मुगल काल में वैद्य और हकीमों के सहयोग से औषधीय पौधोंए औषध निर्माण तकनीकों ;अर्कए माजूनए रोगणए क्वाथए चूर्ण आदिद्ध और क्लीनिकल पद्धतियों का ऐसा संगम विकसित हुआए जिसने ष्तिब्ब.ए.हिंदुस्तानीष् जैसी समेकित चिकित्सा परंपरा को जन्म दिया। शोध में दर्शाया गया है कि नीमए गिलोयए अश्वगंधाए त्रिफलाए सर्पगंधा के साथ इसबगोलए कसनीए अफीमए जैतून जैसे पौधों के संयुक्त प्रयोग से औषध विज्ञानए वनस्पति विज्ञानए कृषि और औषध व्यापारए चारों क्षेत्रों पर गहरा प्रभाव पड़ा। दार.उश.शिफाए बाग़.ए.दवाख़ाना और अतरशाल जैसे संस्थानों के माध्यम से औषध निर्माणए मानकीकरणए आसवन तकनीक और व्यक्तिगत प्रकृतिध्मिज़ाज आधारित उपचार.पद्धतियाँ विकसित हुईंए जो वर्तमान AYUSH और विशेषतः आयुर्वेद-यूनानी समन्वित चिकित्सा की ऐतिहासिक नींव के रूप में उभरती हैं। निष्कर्षतः यह समन्वय केवल दो चिकित्सीय प्रणालियों का जोड़ नहींए बल्कि ज्ञानए अनुभव और संस्कृति के ऐसे बहुस्तरीय संगम का उदाहरण हैए जिसने भारतीय चिकित्सा को समग्रताए बहुलता और वैज्ञानिकता की नई दिशा प्रदान की। मुख्य शब्द: मध्यकालीन भारत, आयुर्वेद, यूनानी चिकित्सा, त्रिदोष सिद्धांत, चार रस सिद्धांत, मिज़ाज, पं समग्र चिकित्सा।चमहाभूत, अखलात, औषधीय पौधे, वनस्पति समन्वय और हकीमय तिब्ब-ए-हिंदुस्तानी, औषध निर्माण।
Fields of Study & Subjects
Military Technology and Strategies
Legal and Regulatory Analysis
Linguistic
Cultural
and Literary Studies
Publication details
- Journal / source
- Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
- Publication date
- 10 January 2026