सवम ववकनद क वचर म मनवमलय

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Authors: दत्त शर्मा ब्रह्म
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Abstract

मानववाद एक ऐसी जीवन पद्धति है जिसमें मानव की गरिमा और मूल्य को विशेष महत्व दिया है। यह दृष्टिकोण मनुष्य के अस्तित्व को ही जगत की सबसे मूल्यवान तत्त्व के रूप में मान्यता देता है। स्वामी विवेकानंद जी वैश्विक पटल पर सदैव युगदृष्टा के रूप में जाने जाते हैं। ऐसे भारतीय चिंतक जिन्होंने मानव जाति को सदैव तमस के गर्त से निकाल कर प्रकाश के मार्ग पर अग्रसर होने हेतु प्रेरित किया। स्वामी विवेकानंद जी मानव निर्माण के लिए एक दिव्य पुंज की तरह सदा प्रकाशमान रहेंगे। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में स्वामी जी के विचार मानव जीवन में प्रेरणा स्त्रोत की तरह ओजवान है जो कि मानव को अनैतिकता भंवर से निकाल कर उसके जीवन में आध्यात्मिक तथा नैतिक प्रकाश को बिखेरता है। स्वामी विवेकानंद इस युग के प्रथम विचारक हैं जिन्होंने हम सभी को अपने देश की आध्यात्मिक, नैतिक, चारित्रिक श्रेष्ठता से अवगत कराया और साथ ही साथ पाश्चात्य देशों की भी अपने भारत देश की भौतिक श्रेष्ठता से परिचित कराया। स्वामी विवेकानंद जी को भविष्य तथा वर्तमान के मध्य की एक फलदायी संयोजक कड़ी के रूप में माना जा सकता है। स्वामी जी एक ऐसे विचारक थे जिन्होंने सदैव मानव निर्माणकारी शिक्षा की वकालत की है उनका कहना था कि शिक्षा ऐसी हो जो मनुष्य को उसके जीवन संघर्षों के लिए तैयार करें तथा उसमें अपार संभावनाओं हेतु साहस भर दें। जिससे वह जीवन की अनगिनत चुनौतियों का पूरे सकारात्मक भाव से डटकर सामना कर सके। उनके अनुसार मानव निर्माणकारी शिक्षा के साथ- साथ उसमें मानवीय गणों, साहस, धैर्य, आत्मविश्वास, व्यावसायिक कुशलता, अंतर्निहित पूर्णता आदि का अद्भुत समावेश भी होना चाहिए। शिक्षा वह शक्तिशाली हथियार है, जिससे मनुष्य का पुनर्निर्माण किया जा सकता है। स्वामी जी कहते हैं मनुष्य ऐसा हो जिसमें अदम्य साहस, उत्कृष्ट इच्छाशक्ति तथा मनुष्य को ईश्वर का मंदिर बनाने की क्षमता विद्यमान हो। स्वामी विवेकानंद जी के विचारों में मनुष्यता का मूल समाहित है। इनका मानना था कि सभी प्राणियों में ईश्वर का अस्तित्व है, इसलिए प्रत्येक मानव ईश्वर की एक अद्भुत रचना है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने भी इनके विषय में कहा है कि यदि आप भारत को जानना चाहते हैं, तो विवेकानंद जी का अध्ययन कीजिए। उनमें सभी कुछ सकारात्मक है, नकारात्मक कुछ भी नहीं है। आधुनिक युग की मांग को ध्यान में रखते हुए स्वामी जी ने कहा था कि " खाली पेट धर्म नहीं होता है।" मानव को शिक्षा प्रदान करने हेतु शिक्षा का स्वभाव कैसे हो? प्राचीन शिक्षा वर्तमान समय में कैसे उपयोगी हो सकती है? प्रस्तुत शोध पत्र मानव मूल्यों,मानव निर्माण पर आधारित शिक्षा का स्वरूप तथा स्वामी विवेकानंद जी के ओजस्वी विचारों की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उपादेयता पर प्रकाश डालता है, जो भारत निर्माण में सहायक हो सके।

Fields of Study & Subjects

Indian History and Philosophy Philosophy and Historical Thought Indian and Buddhist Studies

Publication details

Journal / source
Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
Publication date
13 January 2026