बदध और भमरव अबडकरर: वचर क समजक और दरशनक समनवय

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Authors: डॉ. अजीत कुमार राव, डॉ. प्रशान्त कुमार
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Abstract

बुद्ध और डॉ. भीमराव अंबेडकर का दार्शनिक एवं सामाजिक चिंतन भारत के सामाजिक न्याय और मानवाधिकार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण समन्वय प्रस्तुत करता है। बुद्ध का धम्म मुख्यतः मनुष्य के नैतिक, तर्कसंगत और सामाजिक विकास पर आधारित था। उनका शिक्षण व्यक्तिगत आत्मसुधार के साथ-साथ सामाजिक सद्भाव और समानता की दिशा में था। उन्होंने जाति, संपत्ति या सामाजिक पद के आधार पर भेदभाव को नकारते हुए समतामूलक समाज की परिकल्पना दी। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन और चिंतन में बुद्ध के विचारों को आधुनिक सामाजिक न्याय के रूप में स्वीकार किया। उनका मानना था कि भारतीय समाज में जातिवाद और सामाजिक असमानता को समाप्त करने के लिए बौद्ध सिद्धांतों की नैतिक और तर्कसंगत दृष्टि अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने भारतीय संविधान की रचना में समानता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व के सिद्धांतों को शामिल किया, जिन्हें उन्होंने बुद्ध के धम्म से प्रेरित बताया। बुद्ध और अंबेडकर दोनों का चिंतन समाज सुधार और मानवाधिकार के क्षेत्र में तर्क और नैतिकता को प्राथमिकता देता है। जहाँ बुद्ध ने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में नैतिक अनुशासन पर जोर दिया, वहीं अंबेडकर ने इसे संवैधानिक और राजनीतिक ढांचे में लागू करने का प्रयास किया। इस प्रकार, दोनों के विचार आधुनिक भारत में समानता और सामाजिक न्याय की नींव रखने वाले आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

Fields of Study & Subjects

Indian and Buddhist Studies Indian History and Philosophy South Asian Studies and Diaspora

Publication details

Journal / source
Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
Publication date
17 January 2026
Language
HI