शखर जश क कहनय म परयवरणय चतन एव मनवय सवदन
Abstract
सार:- प्रस्तुत शोध “शेखर जोशी की कहानियों में पर्यावरणीय चेतना एवं मानवीय संवेदना” के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि शेखर जोशी का कथा-साहित्य उनके पर्वतीय परिवेश, सामाजिक यथार्थ और मानवीय अनुभवों की गहन अभिव्यक्ति है। उनके साहित्य में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि न होकर कथा की संवेदनात्मक आत्मा के रूप में उपस्थित रहती है। पहाड़ी जीवन की भौगोलिक विषमता, आर्थिक संघर्ष, विस्थापन, शोषण और अकेलेपन की पीड़ा उनके कथानकों को गहराई प्रदान करती है।शोध में ‘दाज्यू’, ‘कोसी का घटवार’, ‘संवादहीन’, ‘बदबू’ और ‘गलता लोहा’ जैसी प्रमुख कहानियों के विश्लेषण के माध्यम से यह प्रतिपादित किया गया है कि शेखर जोशी ने प्रवास, बाल-मन की करुणा, विधवा-जीवन की त्रासदी, टूटते पारिवारिक संबंध, औद्योगिक शोषण और जातिगत विभाजन जैसे विषयों को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया है। उनकी कहानियों में मानवीय संबंधों की ऊष्मा और उनके विघटन की पीड़ा समान रूप से उभरती है।शेखर जोशी का साहित्य अपने समय तक सीमित न रहकर वर्तमान संदर्भों में भी प्रासंगिक प्रतीत होता है, क्योंकि वह आज के पर्यावरणीय संकट, बढ़ते विस्थापन और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण की ओर संकेत करता है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि शेखर जोशी का कथा-साहित्य प्रकृति, समाज और मनुष्य के बीच संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करता हुआ हिंदी साहित्य में पर्यावरणीय चेतना और मानवीय मूल्यों का सशक्त प्रतिनिधि है। मुख्य शब्द:- पर्वतीय अंचल, मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ, संघर्ष, विस्थापन, अकेलापन, शोषण, मानवीय संबंध।
Fields of Study & Subjects
Ecocriticism and Environmental Literature
Short Stories in Global Literature
Themes in Literature Analysis
Publication details
- Journal / source
- Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
- Publication date
- 31 January 2026