आधनक जवन म समजक बधन क वदरह : करफय
Abstract
प्रस्तुत शोध-लेख में हिन्दी नाट्य साहित्य के प्रमुख प्रयोगशील नाटककार डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल के नाटक कर्फ्यू का समाजशास्त्रीय एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। यह नाटक आधुनिक शहरी जीवन में व्यक्ति पर आरोपित सामाजिक, मानसिक एवं भावनात्मक प्रतिबंधों (कर्फ्यू) को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करता है। नाटककार ने दांपत्य जीवन, स्त्री-पुरुष संबंध, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, भय, कायरता तथा आत्म-पहचान जैसे जटिल प्रश्नों को शहर में लगे कर्फ्यू और दंगों की पृष्ठभूमि में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभारा है। नाटक के प्रमुख पात्र—गौतम, कविता, मनीषा और संजय—अपने-अपने व्यक्तित्व पर लगे सामाजिक व मानसिक कर्फ्यू को तोड़ने का प्रयास करते हैं, जिससे उनके भीतर दबी हुई इच्छाएँ, भय और सच्चाइयाँ उजागर होती हैं। यह संघर्ष व्यक्ति की आंतरिक स्वतंत्रता और सामाजिक मर्यादाओं के बीच टकराव को रेखांकित करता है। कर्फ्यू केवल राजनीतिक या सामाजिक व्यवस्था का चित्रण नहीं करता, बल्कि आधुनिक मनुष्य की कुंठा, असंतोष और आत्म-अन्वेषण की प्रक्रिया को भी सामने लाता है।
Fields of Study & Subjects
Theatre and Performance Studies
Literature: history
themes
analysis
Arts and Performance Studies
Publication details
- Journal / source
- Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
- Publication date
- 28 February 2026