धमतर-महसमद उचच भम कषतर म कमर जनजत क आजवक म बस हसतशलप क भमक

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Authors: संत कुमार बंजारे
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Abstract

प्रस्तुत शोध पत्र धमतरी–महासमुंद उच्च भूमि क्षेत्र में निवासरत कमार जनजाति की आजीविका में बांस हस्तशिल्प की भूमिका का भौगोलिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। बांस हस्तशिल्प कमार जनजाति की परंपरागत वनोपज आधारित आजीविका का एक प्रमुख साधन रहा है, जो न केवल आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, बल्कि उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान से भी घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है। अध्ययन का उद्देश्य कमार जनजाति की आजीविका में बांस हस्तशिल्प के महत्व, इसके समक्ष विद्यमान चुनौतियों तथा युवा पीढ़ी की घटती रुचि के कारणों का विश्लेषण करना है। शोध विवरणात्मक पद्धति पर आधारित है, जिसमें प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के आँकड़ों का उपयोग किया गया है। प्राथमिक आँकड़े क्षेत्रीय भ्रमण, साक्षात्कार एवं अनुसूची विधि द्वारा धमतरी, गरियाबंद एवं महासमुंद जिलों के पाँच चयनित ग्रामों से संकलित किए गए। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि परंपरागत रूप से महत्वपूर्ण होने के बावजूद वर्तमान समय में केवल 1.88 प्रतिशत कमार परिवार ही बांस हस्तशिल्प से जुड़े हुए हैं, जो इसकी सीमांत एवं ह्रासोन्मुख स्थिति को दर्शाता है। कृषि मजदूरी, सीमित कृषि एवं अस्थायी आय स्रोत आजीविका के प्रमुख आधार बन गए हैं, जबकि हस्तशिल्प एवं वनोपज आधारित गतिविधियाँ हाशिये पर चली गई हैं। अध्ययन में कच्चे माल की अनियमित उपलब्धता, तकनीकी पिछड़ापन, वित्तीय संसाधनों की कमी, कमजोर विपणन व्यवस्था तथा सामाजिक परिवर्तन को बांस हस्तशिल्प के पतन के प्रमुख कारणों के रूप में रेखांकित किया गया है। साथ ही यह निष्कर्ष निकाला गया है कि यदि शासकीय योजनाओं, कौशल विकास, मूल्य संवर्धन एवं बाज़ार से प्रभावी जुड़ाव को स्थानीय सहभागिता के साथ समन्वित किया जाए, तो बांस हस्तशिल्प कमार जनजाति के लिए एक सतत, सम्मानजनक एवं आत्मनिर्भर आजीविका का सशक्त माध्यम बन सकता है।

Fields of Study & Subjects

Indigenous Cultures and History Social and Economic Development in India Ethnobotanical and Medicinal Plants Studies

Publication details

Journal / source
Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
Publication date
31 January 2026
Language
HI