यग सधन म धरण-वजञन : शसतरय परपरकषय म एक समगर अधययन
Abstract
योग-दर्शन भारतीय ज्ञान-परम्परा की वह वैज्ञानिक साधना-पद्धति है, जिसका उद्देश्य मानव चेतना का क्रमिक, समन्वित एवं पूर्ण विकास है। पतञ्जलि योगसूत्र में वर्णित अष्टांग योग की साधना-प्रणाली में धारणा को छठे अंग के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, जो प्रत्याहार के पश्चात् तथा ध्यान से पूर्व स्थित होकर चित्त को एकाग्र एवं अनुशासित करने का विज्ञान प्रस्तुत करती है। प्रस्तुत शोध आलेख में ‘धारणा-विज्ञान’ की अवधारणा का शास्त्रीय, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक तथा आधुनिक न्यूरो-विज्ञान के संदर्भ में विस्तृत विश्लेषण किया गया है। इस अध्ययन का उद्देश्य धारणा को केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित न रखकर एक वैज्ञानिक मानसिक प्रशिक्षण-पद्धति के रूप में प्रतिपादित करना है। शास्त्रीय ग्रन्थों, व्यास भाष्य, भोजवृत्ति, योगवार्तिक तथा हठयोगात्मक ग्रन्थों के आधार पर धारणा की सैद्धान्तिक व्याख्या प्रस्तुत की गई है। साथ ही, आधुनिक मनोविज्ञान एवं न्यूरो-विज्ञान के शोध निष्कर्षों के आलोक में धारणा के प्रभावों का विवेचन किया गया है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि धारणा अभ्यास न केवल ध्यान और समाधि की आधारशिला है, बल्कि शिक्षा, चिकित्सा, मानसिक स्वास्थ्य तथा व्यक्तित्व विकास के क्षेत्र में भी अत्यन्त उपयोगी एवं प्रासंगिक है। निष्कर्षतः यह शोध प्रतिपादित करता है कि धारणा-विज्ञान योग-दर्शन की आत्मा है और आधुनिक मानव जीवन की जटिल मानसिक समस्याओं के समाधान की एक प्रभावी कुंजी प्रदान करता है।
Fields of Study & Subjects
Indian and Buddhist Studies
Mindfulness and Compassion Interventions
Traditional Chinese Medicine Studies
Publication details
- Journal / source
- Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
- Publication date
- 15 February 2026
- Language
- HI