अदवत-वदत म सतय-अनभव: वयषट क अतकरमण और समषट-चतन क सकषतकर
Abstract
अद्वैत वेदांत का केंद्रीय प्रतिपाद्य यह है कि सत्य का अनुभव किसी पृथक, सीमित और व्यक्तिकेंद्रित सत्ता (व्यष्टि) का अनुभव नहीं है, बल्कि वह अनुभव तभी घटित होता है जब व्यष्टि-बोध का अतिक्रमण होकर समष्टि-चेतना का साक्षात्कार होता है। यह आलेख इस मूल मान्यता की दार्शनिक विवेचना करता है कि जब भी सत्य का प्रामाणिक अनुभव हुआ है, वह व्यष्टि का नहीं, समष्टि का ही अनुभव रहा है। अद्वैत वेदांत में आत्मा और ब्रह्म का अभेद, ‘अहं’ का अध्यासमूलक स्वरूप, तथा अनुभव की अद्वैत संरचना इस तथ्य की पुष्टि करती है कि अनुभूति का विषय कोई व्यक्तिगत सत्ता नहीं, बल्कि सर्वव्यापक ब्रह्म-चेतना है। समुद्र-लहर, घट-जल, जीव-ब्रह्म के उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि व्यष्टि केवल व्यवहारिक स्तर की संकल्पना है, जबकि सत्य के स्तर पर केवल समष्टि का ही अस्तित्व है। साथ ही, संत परंपरा—विशेषतः कबीर और तुलसी—की वाणी यह दर्शाती है कि अद्वैत का यह दार्शनिक सत्य लोकानुभव और काव्यात्मक अभिव्यक्ति में भी समान रूप से प्रकट हुआ है। इस प्रकार यह आलेख यह प्रतिपादित करता है कि अद्वैत वेदांत में सत्य-अनुभव का अर्थ ‘मैं’ का अनुभव नहीं, बल्कि ‘मैं’ के लोप में ब्रह्म का साक्षात्कार है। इसके अतिरिक्त, यह आलेख यह भी स्पष्ट करता है कि अद्वैत वेदांत में सत्य-अनुभव को किसी असाधारण आध्यात्मिक घटना या मानसिक अवस्था के रूप में नहीं, बल्कि अज्ञान-निवृत्ति से उत्पन्न बोधात्मक परिवर्तन के रूप में समझा जाना चाहिए। इस दृष्टि से सत्य-अनुभव कोई नयी उपलब्धि नहीं, बल्कि सदा-सिद्ध ब्रह्म-चेतना के आवरण-निवारण का परिणाम है। व्यष्टि-बोध का अतिक्रमण ही इस अनुभूति का केंद्रीय आधार है, जिसके फलस्वरूप अनुभव का व्यक्तिकेंद्रित ढाँचा स्वतः विलीन हो जाता है और समष्टि-चेतना का साक्षात्कार संभव होता है। इस प्रकार यह अध्ययन अद्वैत वेदांत में सत्य, अनुभव और मोक्ष के अंतःसंबंध को एक समग्र दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में स्थापित करता है।
Fields of Study & Subjects
Indian and Buddhist Studies
Philosophy and Theoretical Science
Study and Philosophy of Religion
Publication details
- Journal / source
- Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
- Publication date
- 10 January 2026
- Language
- HI