हद सहतय म दलत वमरश
Abstract
यह लेख हिंदी साहित्य में दलित विमर्श की अवधारणा, विकास और सामाजिक भूमिका पर केंद्रित है। दलित विमर्श का उद्देश्य साहित्य के माध्यम से दलित समाज की पीड़ा, शोषण, संघर्ष और आकांक्षाओं को सामने लाना है। लेखक स्पष्ट करते हैं कि परंपरागत साहित्य में दलितों को हाशिए पर रखा गया, जबकि डॉ. भीमराव आंबेडकर की विचारधारा ने दलितों को आत्मसम्मान, चेतना और संघर्ष की दिशा दी। दलित कथा साहित्य और कविता में शिक्षा, समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय जैसे नए जीवन-मूल्य उभरकर आते हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, सुशीला टाकभौरे सहित अनेक रचनाकारों ने जाति-व्यवस्था, शोषण और असमानता के विरुद्ध सशक्त साहित्य रचा। लेख का निष्कर्ष है कि दलित साहित्य प्रतिशोध नहीं बल्कि प्रतिरोध का साहित्य है, जिसने दलित समाज में आत्मविश्वास और चेतना को मजबूत किया है तथा सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को गति दी है।
Fields of Study & Subjects
South Asian Studies and Diaspora
Postcolonial and Cultural Literary Studies
Literature: history
themes
analysis
Publication details
- Journal / source
- Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
- Publication date
- 31 January 2026
- Language
- HI