हद सहतय म वयग सवरप और सकलपन (रम अवतर यदव ज क "मर शरषठ दलत वयग" क सदरभ म)
Abstract
आज की स्थिति में ‘दलित’ शब्द को लेकर बहुत से विवाद खडे हुए है। ‘दलित’ शब्द आज के संदर्भ में एक बहुत व्यापक अर्थ को धारण करता है फिर भी इस पर अलग-अलग विद्वानों का अलग- अलग मत है की, ‘दलित’ किसे कहा जाए? इस शब्द का भारत में 60- 70 साल पूर्व से प्रयोग हो रहा है और तभी से लेकर इस शब्द की व्युत्पत्ती को लेकर विद्वानो में अनेक मतभेद हो चुके है। ‘दलित’ शब्द की व्युत्पत्ती संस्कृत धातू ‘दल’ से हुई है। जिसका अर्थ तोडना, हिस्से करना,उचलना है। इस शब्द के ‘उचलना’ संदर्भ में विभिन्न शब्दकोशों में विभिन्न अर्थ प्राप्त होते है। ‘दलित’ शब्द का प्रयोग सन 1933 के दरम्यान उस समय की सरकारने जो जातीय निर्णय लिया उसमें “डिप्रेस्ड क्लासेस” शब्द का प्रयोग किया है । जिसका अर्थ है, “पददलित” वास्तव में “पददलित” शब्द दलित शब्द के लिए ही पर्यायवाची शब्द के रूप में प्रयुक्त किया जाता है । इसी समय भारत में समाजवादी विचारधारा का प्रादुर्भाव हुआ और इस वर्ग को ही दलित वर्ग के रूप में देखा गया है। इस प्रकार उन्नीस वी शताब्दी से ही भारत में ‘दलित’ शब्द का प्रयोग होता रहा है । भारतीय समाज व्यवस्था में जो बहुसंख लोग है उनको हिंदू धर्मशास्त्र ने मानवी अधिकारों से सदियो से वंचित रखा है। वे 85 प्रतिशत लोग दलित परिभाषा की कोटी में आते है। उपेक्षित अपमानित प्रताडित, प्रतिबंधित और पीडित वे सभी मानव जाती दलित की बृहत परिभाषा में आते है। ‘दलित’ शब्द जब ‘साहित्य’ के साथ मिल जाता है तो साहित्य को एक विशिष्टता प्रदान करत हैं। साहित्य में दलित साहित्य की एक अपनी पहचान स्थापित हो गई है। उसने परंपरागत साहित्य में अपनी एक अलग पहचान बना ली है और वह एक प्रथक धारा के नाम से जाने जाती है। साहित्य के साथ दलित शब्द मिलकर वह दलित साहित्य बन जाता है और साहित्य में अपनी उपस्थिती दर्शता है, जो 15 प्रतिशत शोषको का साहित्य न रहकर 85 प्रतिशत जनसामान्य का प्रतिनिधी साहित्य कहलाता है। हिंदी में दलित साहित्यिक अवधारणा 1960 के बाद हुई है। सबसे पहले मराठी में इसका प्रारंभ हुआ और इसके बाद हिंदी साहित्यने इसकी पहल की। आज बहुत बडे पैमाने में दलित विमर्श हो रहा है । दलित साहित्य विद्रोह का साहित्य है। जनसामान्य व्यक्ती को जीवन के मूलभूत अधिकारों से जिस सत्ता ने जिस धर्म ने जिन रूढी परंपराओने सदैव से दूर रखा ऐसी समाज व्यवस्था को शह देनेवाला साहित्य दलित साहित्य है जो प्रस्थापित व्यवस्था के प्रति विद्रोह है । दलित साहित्य इस व्यवस्था का विरोध करते हुए अपने आत्मक्लेशों,आत्मसंघर्ष,आत्मव्यथा आदि को प स्थापित करता है।
Fields of Study & Subjects
South Asian Studies and Diaspora
Literature: history
themes
analysis
Postcolonial and Cultural Literary Studies
Publication details
- Journal / source
- Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
- Publication date
- 31 January 2026
- Language
- HI