कमर जनजत क सहतय असमत: गदन परपर एव लक-सहतय

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Authors: सुशील सोमवंशी
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Abstract

विशेष पिछड़ी जनजातियों में 'कमार' अपनी विशिष्ट साहित्य अस्मिता की पहचान के लिए जानी जाती है। गरियाबंद और धमतरी जिलों के घने जंगलों में निवासरत इस जनजाति के जीवन में 'गोदना' केवल शारीरिक अलंकरण नहीं, वास्तव मे आध्यात्मिक रक्षा कवच है। 'कमारी' लोकगीत इनके मौखिक इतिहास और साहित्यिक समरसता के परिचालक हैं। कमार जनजाति की गोदना परंपरा सांस्कृतिक प्रक्रिया है, जिसमें शरीर पर अंकन के साथ-साथ स्वर में संस्कृति ओर साहित्य का संचार होता है। गोदना के समय गाए जाने वाले कामारी लोकगीत इस कर्म को केवल देहिक नहीं रहने देते, बल्कि उसे धार्मिक, सामाजिक और भावनात्मक संस्कार में रूपांतरित कर देते हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र में गोदना से जुड़े प्रमुख रूपकों का विश्लेषण करते हुए, उनसे संबंधित लोकगीतों को अधिक मात्रा में समाहित किया गया है, मात्र इसलिए कि किस प्रकार लोक गीत गोदना को अर्थ, दिशा और गरिमा प्रदान करते हैं। यह अध्ययन कमार समाज में देह और लोकगीत के अभिन्न संबंध को उजागर करने का प्रयास मात्र है।कमार जनजाति में गोदना केवल देहिक अलंकरण नहीं, अपितु सांस्कृतिक अभिज्ञान, आध्यात्मिक सुरक्षा और सामाजिक संस्कार का सेतु है।

Fields of Study & Subjects

Folklore Mythology and Literature Studies Cultural and Sociopolitical Studies Indigenous Cultures and History

Publication details

Journal / source
Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
Publication date
31 January 2026
Language
HI