समकलन हद गजल म चतरत समजक चतन
Abstract
समकालीन हिंदी ग़ज़लों में सामाजिक चेतना का स्वर अत्यंत प्रखर एवं यथार्थपरक रूप में उभरता है। आधुनिक ग़ज़लकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त विषमताओं, अन्याय, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, गरीबी, सांप्रदायिकता, स्त्री-विमर्श और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण को सशक्त अभिव्यक्ति दी है। परंपरागत प्रेम और सौंदर्यबोध से आगे बढ़कर समकालीन हिंदी ग़ज़ल सामाजिक संघर्ष, आम आदमी की पीड़ा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का माध्यम बन गई है। इनमें प्रतिरोध, व्यंग्य और करुणा के स्वर स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इस प्रकार समकालीन हिंदी ग़ज़लें न केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति हैं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की चेतना को जाग्रत करने वाला सशक्त साहित्यिक दस्तावेज़ भी हैं।
Fields of Study & Subjects
Poetry Analysis and Criticism
South Asian Studies and Diaspora
Literature: history
themes
analysis
Publication details
- Journal / source
- Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
- Publication date
- 31 January 2026
- Language
- HI