बहर क परपरक वसतर एक ससकतक एव ऐतहसक अधययन
Abstract
बिहार की पावन भूमि न केवल आध्यात्मिक और ऐतिहासिक चेतना का केंद्र रही है, बल्कि यह अपनी अद्वितीय वस्त्र परंपराओं के माध्यम से भारतीय शिल्प कौशल का गौरव भी बढ़ाती रही है। इस शोध पत्र का मुख्य केंद्र बिंदु बिहार के पारंपरिक वस्त्रों जैसे भागलपुरी सिल्क (टसर), मधुबनी की कलात्मक साड़ियाँ, बावन बूटी और सुजनी कढ़ाई के ऐतिहासिक उद्भव, तकनीकी बारीकियों और उनके सामाजिक-आर्थिक महत्व का गहन विश्लेषण करना है। प्राचीन मगध और अंग प्रदेश की समृद्ध विरासत से निकले ये वस्त्र आज भी अपनी प्राकृतिक बुनावट और हस्तशिल्प के कारण वैश्विक बाजार में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए हैं। यह अध्ययन विशेष रूप से इस बात को रेखांकित करता है कि कैसे यहाँ के बुनकरों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी पारंपरिक पद्धतियों को जीवित रखा है, जो न केवल बिहार की लोक-संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, यह शोध पत्र उन चुनौतियों और संभावनाओं की भी पड़ताल करता है, जिनसे यह प्राचीन उद्योग आज दो-चार हो रहा है। वैश्वीकरण और मशीनीकरण के इस दौर में जहाँ पावरलूम और कृत्रिम धागों ने हस्तशिल्प के अस्तित्व के सामने संकट खड़ा किया है, वहीं दूसरी ओर ’जीआई टैग’ और सरकारी प्रोत्साहनों ने इन पारंपरिक वस्त्रों को एक नया जीवनदान भी दिया है। अध्ययन के निष्कर्ष यह स्पष्ट करते हैं कि बिहार के वस्त्र केवल पहनावा नहीं, बल्कि यहाँ की महिलाओं और वंचित समुदायों के सशक्तिकरण का एक सशक्त माध्यम हैं। शोध का उद्देश्य आधुनिक फैशन जगत और पारंपरिक कारीगरी के बीच एक सेतु का निर्माण करना है, ताकि इन लुप्तप्राय कलाओं को संरक्षित किया जा सके और बिहार की इस सांस्कृतिक संपदा को आने वाली पीढ़ियों के लिए और अधिक प्रासंगिक बनाया जा सके।
Fields of Study & Subjects
Fashion and Cultural Textiles
Crafts
Textile
and Design
Software Engineering and Design Patterns
Publication details
- Journal / source
- Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
- Publication date
- 25 February 2026
- Language
- HI
- Document type
- Book chapter