सनम, नटक और जनससकत
Abstract
दादा साहब फालके ने भारतीय सिनेमा की नींव रखी जो बाद के दशकों में बॉलीवुड की दृश्य-शैली ने व्यापक जन-संस्कृति पर असर डाला। समकालीन सिनेमा कभी-कभी प्रतिरोध और सामाजिक विमर्श का स्थल भी रहा है। डिजिटल युग में यह और जटिल हुआ है। दादा साहब फालके ने राजा हरिश्चन्द्र (1913) फिल्म को बनाया और इन्हें ही ‘भारतीय सिनेमा का जनक’ कहा जाता है। उनकी फिल्में और दृश्य-कथा ने फिल्म को एक लोकप्रिय जन-माध्यम के रूप में स्थापित किया। पारसी थिएटर, लोक-नाट्य और शास्त्रीय नाट्य से प्रेरित कथा-शैलियाँ, गीत-संगीत और भावनात्मक ढाँचे ने हिंदी सिनेमा की ‘म्यूजिकल-ड्रामा’ परंपरा को जन्म दिया। फिल्मी सितारों ने सार्वजनिक पहचान और प्रतीकात्मक नेतृत्व का काम किया। वे फैशन, बोलचाल और सामाजिक आकांक्षाओं के मॉडल बने। स्टार-इमेज का जन-संस्कृति पर दीर्घकालिक प्रभाव है, वे न केवल मनोरंजन देते हैं बल्कि सामाजिक आदर्शों और नैतिक विमर्शों को भी आकार देते हैं। भारतीय लोकप्रिय फिल्में समानांतर रूप से नुकसानदेह रूढ़ियों को प्रतिबिंबित भी करती हैं और चुनौती भी देती हैं। फिल्में सामाजिक विमर्शों का एक प्लेटफ़ॉर्म बन चुकी हैं। जैसे रंग दे बसंती, स्वदेश, चक दे! इंडिया, तारे ज़मीन पर आदि ने नागरिकता, लैंगिकता, शिक्षा और न्याय पर सार्वजनिक बहसें उत्पन्न कीं। लोकप्रिय फिल्में सार्वजनिक मनोवृत्ति और नीति-वार्ता को प्रभावित कर सकती हैं। 1990 के बाद आर्थिक उदारीकरण और ग्लोबल मीडिया के प्रभाव से भारतीय सिनेमा में कॉरपोरेटीकरण, ब्रांडिंग, और वैश्विक मिश्रण की प्रवृत्तियाँ आईं। बॉलीवुड की दृश्य भाषा का व्यापक सामाजिक और व्यापारिक विस्तार जो अन्य जन-दृश्यों पर भी दिखाई देता है।
Fields of Study & Subjects
South Asian Cinema and Culture
Cinema History and Criticism
Cinema and Media Studies
Publication details
- Journal / source
- ಅಕ್ಷರಸೂರ್ಯ (AKSHARASURYA)
- Publication date
- 28 February 2026
- Language
- HI