लक स हटकर परवस हद कथ सहतय म यनक भवनओ क अभवयकत

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Authors: नीरजा वी. एस.
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Abstract

गतिशीलता मनुष्य की एक जन्मजात प्रवृत्ति है। मनुष्य की गतिशीलता प्रवासन का रूप और मार्ग निर्धारित करती है। मनुष्य में अपनी सीमाओं को लांघने की जो क्षमता है, वह उनकी इच्छाशक्ति का प्रतिनिधित्व करती है। ऐतिहासिक तौर पर देखें तो प्रवासन का संबंध धर्म से था, मतलब मोक्ष प्राप्ति, धर्म प्रचलन एवं ईश्वर साक्षात्कार से था। इसके अलावा व्यापारिक एवं वाणिज्यिक प्रवासन भी प्रचलित थे। आज वैश्वीकरण के संदर्भ में विश्व एक ‘विश्वग्राम’ में परिवर्तित हो चुका है। वैश्वीकरण ने नए जीवन मूल्यों को जन्म दिया है, इसलिए प्रवासी भारतीय भी वैश्विक भारत को नए संदर्भ के साथ खोजना और समझना चाहते हैं। लेकिन सच्ची बात यह है कि प्रवासन के बाद प्रवासी मानव भावनात्मक स्तर पर अपनी जड़ों से जुड़ना चाहते हैं। प्रवासन एक एहसास है, प्रक्रिया है और मनोभाव भी है। इक्कीसवीं सदी की हिंदी कथा साहित्य में अनेक प्रकार की वैचारिकताएँ एक साथ चलती हैं, कई विमर्श भी प्रचलित हैं जैसे नारी विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, किन्नर विमर्श, पारिस्थितिक विमर्श, प्रवासी विमर्श, मुस्लिम विमर्श, बाल विमर्श, वृद्ध विमर्श आदि। इन विमर्शों ने हिंदी कथा साहित्य को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। वर्तमान जीवन के विविध आयामी विषयों को समकालीन प्रवासी हिंदी कथा साहित्य अपने विषय क्षेत्र में लेती है, जैसे पराए देश में पराए होने की स्थिति, अपरिचित परिवेश में समायोजन के प्रयास आदि। नॉस्टैल्जिया को प्रवासी साहित्य का आधार माना जाता था। प्रवासी साहित्य सिर्फ नॉस्टैल्जिक साहित्य मात्र नहीं। प्रवासी लेखन के द्वारा भारत के लोग अन्य देशों की संस्कृति एवं यथार्थ से परिचय प्राप्त कर सकते हैं और भारत की संस्कृति एवं जीवन मूल्यों से विदेशी पाठक भी परिचय प्राप्त कर सकते हैं।

Fields of Study & Subjects

Travel Writing and Literature Indian and Buddhist Studies Literature: history themes analysis

Publication details

Journal / source
ಅಕ್ಷರಸೂರ್ಯ (AKSHARASURYA)
Publication date
28 February 2026
Language
HI