इककसव सद म भरत क वदश नत: 'वशव मतर' स 'वशव गर' क ओर बढत कदम और भ-रजनतक चनतय
Abstract
इक्कीसवीं सदी में भारत की विदेश नीति एक महत्वपूर्ण परिवर्तनशील दौर से गुजर रही है, जिसमें ‘विश्व मित्र’ की भूमिका से आगे बढ़कर ‘विश्व गुरु’ बनने की आकांक्षा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यह परिवर्तन केवल वैचारिक या सांस्कृतिक स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक कूटनीति, रक्षा सहयोग, डिजिटल नवाचार, जलवायु नेतृत्व और वैश्विक दक्षिण के प्रतिनिधित्व जैसे बहुआयामी आयामों से जुड़ा हुआ है। भारत ने कोविड-19 के दौरान ‘वैक्सीन मैत्री’, आपदा राहत, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय भागीदारी के माध्यम से वैश्विक स्तर पर अपनी विश्वसनीयता स्थापित की है। साथ ही, चीन की बढ़ती आक्रामकता, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, वैश्विक ध्रुवीकरण, ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला अस्थिरता और संयुक्त राष्ट्र सुधार जैसी चुनौतियाँ भारत की विदेश नीति की जटिलताओं को रेखांकित करती हैं। यह अध्ययन दर्शाता है कि भारत की विदेश नीति आदर्शवाद और यथार्थवाद के संतुलन पर आधारित है, जहाँ राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक कल्याण की भावना भी निहित है। यदि भारत अपनी आर्थिक, तकनीकी और सामरिक क्षमता को सुदृढ़ करते हुए नैतिक नेतृत्व बनाए रखता है, तो वह आने वाले दशकों में एक प्रभावशाली और मार्गदर्शक वैश्विक शक्ति के रूप में उभर सकता है।
Fields of Study & Subjects
International Relations and Foreign Policy
Global Political and Economic Relations
South Asian Studies and Conflicts
Publication details
- Journal / source
- Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
- Publication date
- 28 February 2026
- Language
- HI