हद सहतय म भरतय ससकतक मलयबध क सरकषण: परपर स आधनकत तक

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Authors: प्रमोद गोकुळ पाटील
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Abstract

यह लेख हिंदी साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक मूल्यबोध के संरक्षण और निरंतरता का विश्लेषण करता है। संस्कृति किसी भी समाज का मेरुदंड है, जो शिष्टता, सौंदर्यबोध, परंपरा और जीवन-मूल्यों की वाहक होती है। साहित्य जनसमूह की संवेदनाओं का प्रतिरूप होने के कारण समाज की सांस्कृतिक चेतना को अभिव्यक्त करता है तथा उसे समृद्ध भी करता है। आदिकाल से आधुनिक काल तक हिंदी साहित्य में मानवतावाद, आदर्शवाद, नैतिकता, समन्वय, सहअस्तित्व, अहिंसा, लोक-कल्याण, प्रेम और आध्यात्मिक श्रेष्ठता जैसे मूल्यों का विविध रूपों में चित्रण मिलता है। कबीर, तुलसी, पंत, मैथिलीशरण गुप्त, नागार्जुन और नरेश मेहता जैसे रचनाकारों ने इन सांस्कृतिक आदर्शों को अपनी काव्य-रचनाओं में प्रभावी ढंग से स्थापित किया है। संचार-क्रांति और बदलते वैश्विक संदर्भों के बावजूद साहित्य आज भी सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण का सशक्त माध्यम बना हुआ है।

Fields of Study & Subjects

Literary Analysis and Cultural Studies Cultural and Mythological Studies South Asian Studies and Diaspora

Publication details

Journal / source
Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
Publication date
28 February 2026
Language
HI