हद सहतय म चतरत LGBTQI

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Authors: जयसिंग मारुती कांबळे
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Abstract

सारांश वर्तनमान में मानव समाज में लैंगिकता (Gender) और यौनिकता (Sexuality) की अवधारणा केवल स्त्री और पुरुष तक सीमित नहीं है। आधुनिक समय में यह स्पष्ट हो चुका है कि मनुष्य की पहचान, अभिव्यक्ति और भावनात्मक प्रवृत्तियाँ बहुआयामी होती हैं। पारंपरिक द्विलिंगी अवधारणा (स्त्री–पुरुष) से प्रच्छन्न रूप से भिन्न अनेक व्यक्तियों में विशिष्ट शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक तथा अभ्यासगत अभिव्यक्तियाँ पाई जाती हैं। जिन्हें आज के समय में “एल.जी.बी.टी.क्यू.आई.+” (LGBTQI+) समुदाय के अंतर्गत समझा जाता है। यह शब्द अब एक स्वीकृत एवं व्यापक पहचान बन चुका है, जिसके माध्यम से उन सभी व्यक्तियों को शामिल किया जाता है जो पारंपरिक लिंग संरचना और यौनिक मान्यताओं से भिन्न हैं। इन व्यक्तियों की विशेषताएँ, प्रवृत्तियाँ और अनुभव एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी समाज उन्हें प्रायः एक ही दृष्टि से देखता है। जबकि प्रत्येक श्रेणी की अपनी अलग पहचान और संवेदनशीलता होती है—जैसे लेस्बियन (समलैंगिक स्त्री), गे (समलैंगिक पुरुष), बाइसेक्शुअल (उभयलिंगी), ट्रांसजेंडर (लिंगांतरणकारी), इंटरसेक्स (जन्मजात मध्यलिंगी) तथा क्वीर/क्वेश्चनिंग (अस्पष्ट या अन्वेषणशील लैंगिकता)। इनके अनुभवों में आंतरिक लैंगिक भावनाएँ, सामाजिक स्वीकृति का अभाव, जैविक असमानताएँ या आत्म-पहचान संबंधी संघर्ष जैसे अनेक पहलू सम्मिलित होते हैं। समाज एवं उसमें रहेनेवाले लोगों के अनुभवों का प्रतिबिंब साहित्य में मिलता है। हिंदी साहित्य ने अनेक सामाजिक पहलुओं को अपने कथ्य का विषय बनाकर नए नए विचार विमर्शों को उजागर किया है। हिंदी साहित्य ने समाज में उपेक्षित, अस्तित्व के लिए संघर्षरत LGBTQ+ समुदाय को लेकर भी नया विमर्श शुरू किया। सन 2002 में नीरजा माधव ने ‘यमदीप’ उपन्यास से इसकी शुरुआत हुई। समय के साथ प्रदीप सौरभ, चित्रा मुद्गल, गिरीजा माथुर, अनमोल भगवंत, लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी, महेंद्र भीष्म जैसे साहित्यकारों ने इन लोगों को केंद्र रखकर अपना साहित्य लिखा।

Fields of Study & Subjects

Gender and Feminist Studies Literature: history themes analysis South Asian Studies and Diaspora

Publication details

Journal / source
Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
Publication date
31 January 2026
Language
HI