शरमदभगवदगत म अतरनहत मनवजञनकततव
Abstract
श्रीमद्भगवद्गीता केवल धार्मिक या दार्शनिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के मनोविज्ञान का गहन विवेचन प्रस्तुत करने वाला अद्वितीय ग्रंथ है। महाभारत के युद्धभूमि में अर्जुन के विषाद से प्रारंभ हुई गीता मानव-मन की जटिलताओं, संघर्षों और उनके समाधान का मार्ग बताती है। इसमें आत्मा, मन, बुद्धि और अहंकार के आपसी संबंध का विश्लेषण मिलता है, जो आधुनिक मनोविज्ञान के सिद्धांतों से तुलनीय है। गीता व्यक्ति को संयम सिखाती है जो सभी प्रकार के मानसिक रोंगों से सुरक्षित रखती है | श्रीमद्भागवद्गीता में कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और ध्यानयोग के माध्यम से मानसिक संतुलन, आत्मनियंत्रण तथा आत्मबोध की शिक्षा दी गई है। भावनात्मक बुद्धिमत्ता, आत्म-संयम और नैतिक निर्णय की प्रक्रिया को समझने में गीता आज भी प्रासंगिक है। यह शोध आलेख गीता के श्लोकों को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषित करता है और यह दिखाता है कि गीता मानव-जीवन के लिए सभी कालों में विजित मनोवैज्ञानिक पथप्रदर्शिका है।
Fields of Study & Subjects
Indian and Buddhist Studies
Religion
Spirituality
and Psychology
Jungian Analytical Psychology
Publication details
- Journal / source
- Zenodo (CERN European Organization for Nuclear Research)
- Publication date
- 2 March 2026
- Language
- HI