इककसव सद क हनद कहनय म बजर क हसतकषप
Abstract
21वीं सदी की हिन्दी कहानी में बाजारवाद का प्रभाव बहुत व्यापक तरीक़े पर देखा जा सकता है। नब्बे के दशक के बाद हिन्दी कहानी ने सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों के साथ अपने रूप और दृष्टि दोनों में परिवर्तन किया था। पर 21 वीं सदी में उपभोक्तावाद और वैश्वीकरण में ‘बाजार’ केवल आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि मानवीय संबंध, संवेदनाओं और साहित्यिक दृष्टिकोणों को भी प्रभावित किया है। बाजारवाद के कारण जहाँ आज पूरा विश्व एक परिवार की तरह बन गया है। वहीं इसी बाजारवाद ने परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे को बहुत अकेला कर दिया है। हिन्दी कहानीकारों ने इस ‘बाजारवादी युग’ को संवेदनशील नज़र से देखा और अपने पात्रों, घटनाओं तथा प्रतीकों के माध्यम से इस हस्तक्षेप को चित्रित किया है। अब कहानी का प्रमुख पात्र किसान या मज़दूर मात्र नहीं, बल्कि उपभोक्ता भी है जो अपने अस्तित्व को बाजार के मानकों रखने के लिए मजबूर है। पंकज मित्र की 'क्विज मास्टर', सविता पांडेय की 'फैशनिस्टा', मनोज कुमार पांडेय की 'पानी', संजय कुंदन की 'बॉस की पार्टी', नीलाक्षी सिंह की 'प्रतियोगी', चन्दन पाण्डेय की 'सिटी पब्लिक स्कूल, वाराणसी’, अनिल यादव की 'आर.जे. साहब का रेडियो' कैलाश वनवासी की 'बाजार में रामधन' आदि कहानियाँ बाजार को केंद्र में रखकर लिखी गई महत्वपूर्ण कहानियाँ है। प्रस्तुत शोध-पत्र में यह कुछ कहानियों का विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार 21 वीं सदी में बाजार ने कहानियों की विषयवस्तु, शिल्प और चरित्रों के मानवीय संवेदना को प्रभावित किया है ।
Fields of Study & Subjects
Short Stories in Global Literature
Contemporary Literature and Criticism
Literary Theory and Cultural Hermeneutics
Publication details
- Journal / source
- International Journal of Engineering Development and Research
- Volume
- 14
- Issue
- 1
- Publication date
- 1 February 2026
- Language
- EN