जत और लग क सयकत परभव स उतपनन समजक असमनत और सभवनए
Abstract
यह अध्याय भारतीय समाज में जाति और लिंग के अंतर्संबंध से उत्पन्न सामाजिक असमानता की पड़ताल करता है। जाति व्यवस्था और पितृसत्ता दोनों ही ऐसी सामाजिक व्यवस्थाएँ हैं जो व्यक्ति की पहचान, अवसरों और अधिकारों को नियंत्रित करती हैं। जब ये दोनों तत्व एक साथ कार्य करते हैं, तो वे विशेष रूप से दलित और पिछड़ी जातियों की महिलाओं के लिए बहुस्तरीय भेदभाव की स्थिति उत्पन्न करते हैं। अध्याय में “इंटरसेक्शनैलिटी” की अवधारणा को सैद्धांतिक आधार के रूप में प्रयोग किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जाति और लिंग का संयुक्त प्रभाव केवल सामाजिक विषमता को नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक संरचनाओं को भी प्रभावित करता है। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में मनुस्मृति, फुले दंपत्ति, और डॉ. आंबेडकर के विचारों का विश्लेषण करते हुए अध्याय दिखाता है कि स्त्री मुक्ति का प्रश्न जाति व्यवस्था के उन्मूलन से अविभाज्य है। दलित नारीवाद के उभरते स्वर, जैसे उर्मिला पवार, बामा, और शर्मिला रेगे के लेखन, यह संकेत देते हैं कि दलित स्त्रियों की पहचान “केवल स्त्री” या “केवल दलित” के रूप में नहीं, बल्कि एक अंतर्संबंधित इकाई के रूप में देखी जानी चाहिए। अंततः, अध्याय यह निष्कर्ष निकालता है कि सशक्तिकरण की संभावनाएँ शिक्षा, राजनीतिक भागीदारी, और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के विस्तार में निहित हैं। इस प्रकार, जाति और लिंग के संयुक्त अध्ययन से न केवल सामाजिक असमानता की प्रकृति स्पष्ट होती है, बल्कि एक समावेशी, न्यायसंगत समाज के निर्माण की दिशा में नई संभावनाएँ भी उद्घाटित होती हैं।
Fields of Study & Subjects
South Asian Studies and Diaspora
Social and Economic Development in India
Gender
Health
and Social Inequality
Publication details
- Pages
- 93–100
- Publication date
- 30 January 2026
- Document type
- Book chapter