हद सहतय और रषटरय चतन: ऐतहसक दषटकण

Read full text
Authors: प्रौ. डाॅ. अणु कांत मित्तल
Cited by: 0

Abstract

हिंदी साहित्य केवल सौंदर्यात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रहा है, बल्कि वह भारतीय समाज की आत्मा, उसकी ऐतिहासिक स्मृति और उसकी सामूहिक चेतना का संवाहक भी रहा है। समय–समय पर बदलती राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों ने जिस प्रकार राष्ट्रबोध को आकार दिया, उसी प्रकार हिंदी साहित्य ने उस चेतना को शब्द, संवेदना और दिशा प्रदान की। प्रस्तुत पुस्तक “हिंदी साहित्य और राष्ट्रीय चेतना: ऐतिहासिक दृष्टिकोण” इसी गहरे अंतर्संबंध का समग्र अध्ययन प्रस्तुत करती है। भारतीय राष्ट्रीय चेतना का विकास किसी एक घटना या काल का परिणाम नहीं है, बल्कि यह सदियों तक चले सामाजिक अनुभवों, सांस्कृतिक परंपराओं और वैचारिक संघर्षों से निर्मित हुई है। हिंदी साहित्य-भक्ति आंदोलन की जनभाषा से लेकर आधुनिक और समकालीन लेखन तक-इस चेतना को निरंतर अभिव्यक्त करता रहा है। कभी यह समता और मानवता के स्वर में सामने आई, तो कभी स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय की आकांक्षा के रूप में। इस पुस्तक का उद्देश्य हिंदी साहित्य के विभिन्न कालखंडों का अध्ययन करते हुए यह स्पष्ट करना है कि साहित्य ने राष्ट्रीय चेतना को केवल प्रतिबिंबित ही नहीं किया, बल्कि उसे गढ़ने, विस्तार देने और आलोचनात्मक दृष्टि प्रदान करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह कृति छात्रों, शोधार्थियों और साहित्य–रसिक पाठकों के लिए एक वैचारिक मार्गदर्शक के रूप में तैयार की गई है, जिससे वे हिंदी साहित्य को केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र की जीवंत चेतना के रूप में समझ सकें। आशा है कि यह पुस्तक पाठकों को इतिहास, साहित्य और राष्ट्र के बीच स्थापित इस गहन संवाद को समझने में सहायक सिद्ध होगी तथा हिंदी साहित्य के अध्ययन को नई दृष्टि और गहराई प्रदान करेगी।

Fields of Study & Subjects

South Asian Studies and Diaspora Historical and Literary Analyses Literature: history themes analysis

Publication details

Publication date
1 January 2026
Document type
Book